कारावास | Karavas

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : कारावास - Karavas

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about विजय चौहान - Vijay Chauhan

Add Infomation AboutVijay Chauhan

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
प्रारंसिक त्रतुमव जेल की जिन्दगी के प्रारंभिक दिन श्रब भी स्पष्ट रूप से मेरी आँखों के सामने झ्राते हैं । कैद के बाक़ी बरसों की स्मृति भ्रब घुंधली हो गई है, कुछ बरप्त तो पिघलकर विस्मृति के गर्भ में खो गये हैं--सिर्फ़ उनकी श्तंकभरी, .नीरस श्रौर दम घोंटने वाली श्रनुभूति बाक़ी है । लेकिन साइबेरिया .में गुजारे प्रारंभिक दिनों की घटनायें मेरे दिमाग में. बिल्कुल नाज़ो हैं, लगता है, जैसे ये सब कल हीं की बातें हैं । ऐसा होना. स्वाभाविक भी है । मुझे भ्रच्छी तरह याद है कि जेल की जिन्दगी की जिस बात ने सबसे पहले मेरा ध्यान श्रा्कर्षित किया था, वह थी वहाँ की साधारणता १ वहाँ कोई विलक्षण या श्रप्रत्याशित बात नहीं होती थी । लगता था जैसे साइवेरिया के रास्ते में ही मुक्ते भावी जीवन की कलक मिल छुकी थी । लेकिन साइवेरिया पहुँचने के बाद ही मुझे हर क़दम पर श्रमानु- घिक॑ यरथाधों का सामना करना पड़ा । बहुत दिनों बाद, जब मैं जेल के जीवन का ्रांदी . हो गया था, मुक्ते उस जीवन की. विलक्षणता श्ौर अ्रसाधारणुता का श्राभास हुमा श्रौर मेरा झाइचये दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया । सच पुद्धिये तो बरसों लंबी क़ैद काटने के बाद भी मेरे उस श्राइचर्य में कमी नहीं हुई । जेल में घुसते ही मेरा मन वितृष्णा से भर . गया, लेकिन श्राइचये है कि जेल की ज़िन्दगी मेरी कल्पना से कहीं श्धिक श्रासान थी 1 क्रंदियों ने बेड़ियाँ जरूर पहन रखी थीं, लेकिन वे जेलभर में मटरगती करते; गाते, ऋूमते, सिगरेट श्रौर वोदूका पीते, गालियाँ बकते फिरते थे (वोदूकों बहुत थोड़े क़ैदी ही पीते थे) । रात के वक्‍त कुछ लोग .तादा भी खेलते थे । मुकते जेल की मशवकत भी इतनी “कड़ी” नहीं मालूम हुई,




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now