श्री तिलोक शताब्दी अभिनंदन ग्रंथ | Shree Tilok Shatabdi Abhinandan Granth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्पादकीय- अपने ग्राम वल्लभनगर में मेरे मकान के निकट ही जैन धर्म स्थानक होने से मेरा यह सौभाग्य रहा है कि मेरे कर्ण-कहरो को शैक्षवावस्था से ही सायकालीन प्रतिक्रमण के समय पुज्यपाद श्रीतिलोककऋषिजी महाराज की श्रुतिमधुर गेंयप्रधान पाँच पदों की वंदना पवित्र करती रही है । उनकी इस वदना से आकर्षित हो मेने माठ नौ वर्ष की अवस्था में ही स्वयं प्रेरणा से सामायिक प्रतिक्रमण भादि आावद्यक सुत्र कठस्थ किये । कुछ मधिक समझ मे भाने पय वाल्यावस्था मे ही मेरे मन मे यह जिज्ञासा हुई कि इस भाव-वदना में सबको आकर्षित करनेवाले यह * तिलोख रिख ' कौन है? अध्ययनानन्तर समाज से दूर विशाल क्षेत्र में विविध विद्याविषयक प्रवृत्तिभों में रत रहने के कारण अपनी वह जिज्ञासा मस्तिष्क में सरकार रूप से श्थ्रित थी । अत में इस वर्ष जुलाई महीने के मध्य में उपाध्याय मुनि श्री आनंदऋषिजी महाराज के दर्शन होनेपर उन्होंने मेरे सामने श्री तिलोक ऋषिजी महाराज का जीवन-चरित्र लिखनें का प्रस्ताव रखा । उस समय आपने प्रस्तुत “अभिनदन ग्रथ कीं चर्चा नही की थी । इस महा मुनि के प्रति मेरी बचपन से श्रद्धा थी। तत्काल आपके इस प्रस्तावानुसार कार्य करना प्रारंभ कर दिया । में अपनी योजनानुसार स्व० रत्नऋषिजी महाराज के परिणिप्टवर्ती जीवन चरित्र की तरह इन ' ऋषि वरेण्य ' का आधुनिक शैली में जीवन चरित्र लिखना चाहता था, कितु बहुत ऊहापोह के पश्चात्‌ अभिनंदन ग्रन्थ वर्ती रूप ही निश्चित किया गया। इसे भी में एक विधि का सकेत ही समझता हूँ, क्योकि आज से दस साल पहले मंसुरी में महापडित श्री राहुल साकृत्यायन के साथ कार्य करते समय उनकी घ्रेरणा से ' वुद्धचर्या ' की तरह ' महावीर चर्या ' लिखने का मैने निदचय किया था । वह कार्य कुछ प्रारम भी कर दिया था, पर आवश्यक आागम ग्रथो के अभाव के कारण उस आरव्ध काय॑ को वहीं स्थगित करना पड़ा । न मालूम वह कार्य कब सपन्न होगा, पर उन श्रमण भगवान्‌ महावीर द्वारा उपदिष्ट प्ित्र सबसे मार्ग को ग्रहण कर अपने जीवन को पवित्र बनानेवाले इस ' ऋषि पुगव की चर्या लिखकर घन्यता का अनुभव करता हूँ । पुज्यपाद श्री तिलोककऋषिजी महा- राज का यह जीवन-चरित्र; जीवन चरित्र नहीं वरन्‌ु “श्री तिछोक चर्या है । आपकी इस चर्या में उनकी देनदिनी के अनुसार प्रत्येक वर्ष का विदिष्ट कार्यविव- रण हैं । मालव प्रात से विहार कर विन्ध्य एवं सातपुड़ा पवत के वीहड घाटो को पार करते हुए जव आप महाराष्ट्र में पघारे उस समय रास्ते में पडनेवाली नमंदा और ताप्ती नदियों का इसमें हूबहू वर्णन है। नमेंदा नदी के पुल पर ठगी हुईं




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