पंच संग्रह | Panch Sangrah

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( रश ) २४-मिथ्यात्व और सासादन इन दो गुणस्थानों मे का्मंग्रस्थिक मतानुसार अज्ञानत्रिक और चक्षु-अचक्षु दर्शन, कुल पॉच उपयोग होते है। जबकि सिद्धान्त मे अवधिदर्शन सहित छह उपयोग माने है | दिगम्बर साहित्य का सत काममंग्रन्थिक मत जैसा है । ३०--कार्मग्रन्थिको ने मनुष्यगति मे पर्याप्त-अपर्याप्त सज्ञी पचे- न्द्रिय रुप दो जीवस्थान माने है, और सिद्धान्त मे उक्त दो के साथ अपर्याप्त असज्ञी पचेन्द्िय जीवस्थान भी बताया है । ३१--दिगम्बर साहित्य मे मनोयोग मे एक सज्ञी पचेत्द्रिय पर्याप्त जीवस्थान माना है और दवेताम्बर साहित्य में अपर्थाप्त-पर्याप्त सज्ञी इन दो जीवस्थानो के होने का सकेत किया है । ३२-सिद्धान्त मे असज्ञी पर्याप्त और अपर्याप्त इन दो मे मात्र नपु सकवेद माना है और कार्मग्रन्थिक मतानुसार इनमे पुरुषवेद और स्त्रीवेद भी है । ३३--कार्म ग्रन्थिको ने अज्ञानत्रिक मागेणाओ मे आदि के तीन गुणस्थान साने है । लेकिन सिद्धान्त के मतानुसार प्रथम, द्वितीय ये दो गुणस्थान है। दिगम्बर परम्परा मे भी अज्ञानन्रिक में आदि के दो गुणस्थान होने का मत स्वीकार किया है । ३४- सिद्धान्त में अवधिदर्शन से पहले से लेकर बारहवे तक बारह गुणस्थान माने है । लेकिन कतिपय का्मग्रन्थिक आचाय॑ चौथे से वारहवे तक नौ गुणस्थान और कुछ तीसरे से बारहवे तक दस गुण- स्थान मानते है। दिमम्बर परम्परा मे भी इन दोनो मतो का उल्लेख है । ३५--दवेताम्बर साहित्य मे सुखपूवंक जागना हो जायें उसे निद्रा कहा है, जबकि दिगम्वर परम्परा ने निद्रा का अर्थ किया है कि जीव- गन करते हुए भी खडा रह जाये, बैठ जाये, गिर जाये । इसी प्रकार प्रचला के लक्षण मे भी भिन्नता है । दवेताम्वर साहित्य मे प्रचला का“ ' लक्षण बताया है कि जिस निद्रा मे वेठे-बैठे या खड़े-खड़े नीद आरे




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