चौबीस तीर्थकर महापुराण | Chouvis Tirthkar Mahapuran

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Chouvis Tirthkar Mahapuran by ब्र. हरिलाल जैन - Bra. Harilal Jainमगन लाल जैन - Maganlal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१७५ : भगवान क्रषभदेव (म हापुग ण) [सिपना भगवान राजा व़जघ और श्रीमती भोजन की तैयारी कर ही रहे थे कि इतने मे अचानक दो गणनविहारी मुनिवर दमधर और सागरसेन वहाँ पधारे। अहा, मुनिवर पधारे मानों साक्षात्‌ मोक्षमार्ग ही आगया! आकाण से उतरते हुए मुनिवरो को देखकर ही राजा तथा मंत्री आदि सबको महान आनन्दाश्चर्य हुआ | अि, बनके सिह, बन्दर, शूकर और नेवला जैसे पशु भी मुनिराज को देखकर अति हर्षित हो उठे। उन मुनिवगों की वनमे ही आहार लेने की प्रतिज्ञा थी। वे अत्यन्त तेजस्वी और पवित्रता से शोध्पायमान थे मानों स्वर्ग और मोक्ष यहीं पृथ्वीपर उतर आये हों दोनों मुनिवर डेरे के निकट आते ही राजा-रासीने अति आनद एवं भक्ति सहित उनका पडगाहम किया कि - हे स्वामी फ्यारो. पघारा पघारो ! द मुनराज के रुकते ही वज़जघ और श्रीमती ने भक्तिपूर्वक उमकी प्रदक्षिणा की, ममस्कार करने. सन्मान किया और योग्य विधिपूर्वक भोजनशाला मे प्रवेश कराके उच्चासनपर बिठाया। उनके चरणी का प्रक्षालन, पूजन एवं नमन किया और पश्चात्‌ मन-वरान-काया की शुद्धिपूर्वन्ण दाता के सात मुण (श्रद्धा, संतोष, भक्ति आदि) सहित विशुद्ध परिणागों हो उमग उत्तम सुनिवरा करो विधिपूर्वक आहारतान दिया (अभी उन्हें खबर नहीं है कि. जिन्हे नाहारटान दिया वे. उसके अपन पत्र ही थे।) मुक्िगिज को आहारदान का सह भव्य आनन्दकारी प्रसंग था । उस उत्तम आहारदान के प्रभाव रो तुग्त ही वहाँ पॉच आशर्यजनक वस्तु, प्रगट हुई... 1#) आकाश से रत्नवृष्टि होने लगी; (२) पुष्पवर्षा होने त्तगी. (३) सुगंध बलरसते लगी, न (४) दुदुभि बाजे बजने लगे, और ('« ) आकाश में देवगण 'अहो गुर ६. श्री नती, दान महादान' ऐसे शब्दपूर्वक जयजयकार करने लगे । आहारदान के पश्चात्‌ दोनो पुनिवरों को लन्दन और पृजन कर के जब वज़जघ उन्हे विदा करने लगे तब अत 'पुरकी दासीने कहा. राजन! यह दोनों मनियर आपके सबस छोटे पुत्र ही है। यह सुनकर ही वज़जप और श्रीमती अति प्रेमपूर्वक उनके निकट गय और उनके धर्मभवण किया। फिर वज़जघने अपने और श्रीमती के पूर्व भव पृछे। मुगिवरा ने दोनो के पूर्वभतर (ललिताग तेव और स्वयप्रभादेवी) का वर्णन फ्रिया। तत्पश्ात वज़जघते पुन पूछा... हि नाश! यह मतिवर मत्री, आमन्द पुरोहित, धनमित्र सेठ और अकम्पन सेनापति यह यागें जीव मुझे भाई की तरह अत्यन्त प्रिय है, इसलिये कृपा करके आप उनके भी पूर्वभव कहे! 2 मुनिराजने कहा है राजन इन मतिवार सत्री बा जीव पूर्वभव में सिह था। एकवार प्रीतिवर्धन राजाने वन मे मुनि को आहार दा दिया, उसे देखकर सिह को जाति स्मरण हो गया,जिससे वह बिलकुल शात हो गया और आहारांदि का त्याग करके एक शिलापर जा बैठा। मुनिराजने अवधिज्ञान द्वारा वह जानकर प्रीतिवर्धन राजासे कहा * हे राजन! यह सिह श्रावक के ब्रत धारण करके संन्यास ले रहा है,




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