श्रीमद भागवतमहापुराण | Srimad Bhagwat Mahapurana

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महर्षि वेद व्यास - Mahrshi Ved Vyas

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हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अ० रे दशम स्कंन्थ १५ न नावायकालयन र वाफकलकललपायनन कल लि यथा था होने पाये । अब उनका मन सहसा प्रसन्नतासे भर गया । ठगे। विद्याथर्यों अप्सराओंके साथ नाचने ठगी ॥६॥ जिस समय भगवान्‌के आविर्मावका अवसर आया खर्गमें बढ़े-वढ़े देवता और ऋषि-मुनि आनन्दसे भरकर पुष्योंकी देवताओंकी दुन्दुमियोँ अपने-आप बज उठीं ॥ ५ ॥ वर्षा करने छगे# । जे मरे हुए वादल समुद्रके पास किन्नर और गन्धर्व मघुर खरमें गाने ठगे तथा सिंद्र॒ जाकर धीरे-धीरे गजना करने ठगे 1 ॥ ७ | जन्म-गृत्युके और चारण मगवानके मड्छ्मय गु्णोंकी स्तुति करने चक्रसे छुड़ानेवाले जनाद॑नके अवतारका समय था २. खामीके झुमागमनके अवप्रपर जैसे सेवक स्वच्छ वेप-भूपा घारण करते हैं और शान्त हो जाते हैं इसी प्रकार आकाशके सब नक्षत्र ग्रह तारे शान्त एवं निर्मठ हो गये । वक्ता अतिचार और युद्ध छोड़कर श्रीकृष्णका स्वागत करने लगे । नक्षत्र-- मैं देवकीके गर्भतते जन्म ढे रहा हूँ तो रोहिणीके संतोपके छिये कम-से-कम रोहिणी नक्षत्रमें जन्म तो लेना दी चाहिये । अथवा चन्दरवंधर्में जन्म ले रहा हूँ तो चन्द्रमाकी सबसे प्यारी पत्नो रोहिगीमें ही जन्म लेना उचित है। यदद सोचकर भगवानते रोहिणी नक्षत्रमें जन्म दिया । सने--- १. योगी मनका निरोध करते हैं मुमुझु निर्विपय करते हैं और जिज्ञासु बाघ करते हैं । तस्तरज्ञॉंने तो मनका सत्यानादा दी कर दिया । भगवान्‌के अवतारका समय जानकर उसने सोचा कि अपर तो मैं अपनी पत्नी--इन्द्रियों और विषय --चरालनवच्चे सबके साथ ही भगवानके साथ खेदूँगा । निरोध और याधसे पिण्ड छूटा । इसीसे मन प्रसन्न हो गया | २. निर्मछको ही भगवान्‌ मिलते हैं इसलिये मन निर्मल हो गया | ३. वेसे दाव्द स्पर्श रूप रस गन्धका परित्याग कर देनेपर भगवान्‌ मिलते हैं । अब तो स्वयं भगवान्‌ दी वह सब बनकर आ रहे हैं | लौकिंक आनन्द मी प्रभुमें मिलेगा । यह सोचकर मन प्रसन्न दो गया । ४. वसुदेवके मनमैं निवास करके ये ही भगवान्‌ प्रकट हो रहे हैं। वदद मारी ही जातिका है यद्द सोचकर मन प्रसन्न दो गया । ५. सुमन देवता और झुद्ध मन को सुख देनेके छिये दी भगवानका अवतार दो रहा है । यदद जानकर सुमन प्रसन्न हो गये । ६. संतोर्मि खर्गम॑ं और उपबनमें सुमन शुद्ध मन देवता और पुष्प आनत्दित हो गये । क्यों न दो माधव विष्णु और वतन्त का आगमन जो हो रहा है । भाद्मास-- भद्र अर्थात्‌ कल्याणका देनेब्राद्य है । कृण्णपक्ष ख़य॑ कृणसे सम्बद्ध है । अछ्मी तिथि पक्षके वीचोीच सन्धिस्यलपर पड़ती है। रात्रि योगीजनोंको प्रिय है । निशीध यतियोंका संध्याकाल और सात्रिके दो मार्गोकी सन्धि है । उस समय श्रीकृण्णके आविर्भावक्रा अर्थ है--अज्ञानके घोर अन्धकारमें दिव्य प्रकाश । निशानाथ चन्द्रके वंदामि जन्म लेना है तो निशाके मध्यमागम अवतीर्ण होना उचित भी है । अष्रमीके चन्द्रोदयका समय मी वद्दी है। यदि बदुदेवजी मेरा जातकर्म नहीं कर सकते तो हमारे वंशके आदिपुरुप चन्द्रमा समुद्रस्नान करके अपने कर-किरणोंसे अम्रत्तका वितरण करें । # श्रूषि मुनि और देवता जय अपने सुमनकी वर्षा करनेके लिये मथुराकी ओर दौड़े तय उनका आनन्द भी पीछे छूट गया और उनके पीछे-पीछे दौड़ने छगा । उन्होंने अपने निरोध और वाधसम्बन्धी सारे विचार त्यागकर मनको श्रीकृण्णकी ओर जानेके लिये मुक्त कर दिया उनपर न्योछावर कर दिया | 1 १. मेव समुद्रके पास जाकर मन्द-मन्द गजना करते हुए कहते--जलनिघषे यह तुम्हारे उपदेदा पास आने का फ है कि हमारे पास जल-द्वी-जल हो गया । अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि ेसे हुम्हारे भीतर मगवान्‌ रहते हैं वेसे हमारे मीतर भी रहें । २. बादल समुद्रके पास जाते और कहते कि समुद्र तुम्हारे छृदयमें मगवाद्‌ रहते हैं हमें भी उनका दर्गान-प्यार प्रात करता दो | समुद्र उन्हें थोड़ासा जल देकर कद्द देता-अपनी उत्ताल तरज्ञँसे ढकेठ देता-जाओ




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