हिंदी साहित्य कोश भाग 2 | Hindi Sahitya Kosh Bhag 2

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Hindi Sahitya Kosh Bhag 2  by धीरेन्द्र वर्मा - Deerendra Vermaरामस्वरूप - Ramsvrup

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अंबरीषद--अंधिका नगरीका हाल मालूमकर वह ऐसी नगरीमें रहना उचित न समझ तीसरे अंकमें वहांसे चलनेके लिए अपने शिष्योंसे कहता है। किन्तु गोबर धनदास लोभके वशी भूत हो वहीं रह जाता है और महन्त तथा नारायणदास चले जाते हैं। चौथे अंकमें पीनकमें बैठा राजा एक फरियादीकी बकरी मर जानेपर कल्लू | बनिया कारीगर चनेवाले भिश्ती कसाई और गड़रियाको | छोड़कर अन्तमें अपने कोतवालको ही फाँसीका दण्ड देता है क्योंकि अन्ततोगत्वा उसके सवारी निकलनेसे ही बकरी दबकर मर गयी । पाँचवें अंकमें कोतवालकी गर्दन पतली होनेके कारण गोबर धनदास पकड़ा जाता है ताकि उसकी मोटी | गर्दन फाँसीके फन्देमें ठीक बैठे । अब उसे अपने गुरुकी बात याद आती है । छठे अंकमें जब वह फाँसीपर चढ़ाया जानेको है गुरुजी और नारायणदास आ जाते हैं । गुरुजी गोबर धनदासके कानमें कछ कहते हैं और उसके बाद दोनोंमें फाँसीपर चढ़नेके लिए होड़ लग जाती है । इसी समय राजा मन्त्री और कोतवाल आते हैं। गुरुजीके यह कहनेपर कि इस साइतमें जो मरेगा सीधा बैकण्ठको जायगा मन्त्री और कोतवालमें फाँसीपर चढ़नेके लिए प्रतिद्वन्द्धिता उत्पन्न हो जाती है। किन्तु राजाके रहते बैकण्ठ कौन जा सकता है ऐसा कह राजा स्वयं फाँसीपर चढ़ जाता है । ज़िस राज्यमें विवेक-अविवेकका भेद न किया जाय वहाँकी प्रजा सुखी नहीं रह सकती यह व्यक्त करना इस प्रहसनका उद्देश्य है । -ल० सा० वा० अंबरीष-अयोध्याके सूर्यवंशी राजा अम्बरीष। ये इक्ष्वाकुवंशकी २८ वीं पीढ़ीमें हुए थे । इन्हें कहीं प्रशुश्रककां पुत्र कहा गया है और कहीं नाभागका । ये भगीरथके प्रपौत्र थे । ये अत्यन्त पराक्रमी तथा वीर थे । कहा जाता है कि इन्होंने १० लाख राजाओंको रणमें पराजित किया था । ये एक पहुँचे हुए विष्णु-भक्त भी थे । ये अपना समस्त राज्य-कार्य कर्मचारियों के सरक्षणमें छोड़कर अधिकांश समय भगवतृभजनमें बिताते थे । इनकी कन्याका नाम सुन्दरी था जो कि गुणोंकी दृष्टिसे भी | सार्थक था । एक बार देवर्षि नारद तथा पर्वत स॒न्दरीपर मोहित हो गए और उसे पानेकी चेष्टा में विष्णके पास गये । नारदने पर्वतके लिए और पर्वतने नारदके लिए विष्णसे प्रार्थनाकी कि वे उनका मुख बन्दरका-सा बना दें । विष्णुने दोनोंकी प्रार्थना स्वीकार कर दोनोंका मुख बन्दरका बना दिया। दोनों व्यक्तियोंकी आकृति बन्दरोंकी देख सुन्दरी भयभीत होकर पिताके पास गयी ।जब अम्बरीषके साथ वापस आयी तो दोनोंके मध्य भगवान्‌ .विष्णुको भी बैठे पाया। सुन्दरीने वरमाला उनके गलेमें डाल दी और विष्णुकी प्रेरणासे अन्तर्धान हो गयी । दोनों ऋषियोंने क्रो घावेशमें अम्बरीषको शाप दिया कि वे स्वयं अन्धकारावृत होकर अपना शरीर तक न देख सकें। इसपर अम्बरीषके रक्षार्थ विष्णुका चक्र सुदर्शन उपस्थित हुआ और अन्धकारका विनाश कर मुनियोंकी बर लेनेको तत्पर हुआ। दोनों मुनि भागते-भागते विष्णुकी शरणमें गये तब भगवान द्वारा क्षमा किये जानेपर चक्र-सुदर्शनके आतंकसे मुक्त हुए । सब बात यह थी कि राघा लक्ष्मी सुन्दरीके रूपमें अम्बरीषके यहाँ अवतीर्ण हुई थीं और उन्होंने श्रीकृष्ण विष्णु को पति रूपमें पानेके लिए अपूर्व तपस्याकी थी । इसी प्रकार एक बार द्वादशीके दिन अम्बरीष पारण करने जा रहे थे कि दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों समेत आ दे पहुँचे । अम्बरीषने भोजनके लिए उन्हें आमस्त्रित किया पर वे निमन्त्रण स्वीकार कर सन्ध्या वंदनके लिए चले गये । वहाँ उन्होंने जान-बूझकर देर कर दी । द्वादशी केवल एक पल शेष रह गयी द्वादशीमें पारण न करनेसे दोषका भागी होना पड़ता है। अतः अम्बरीषने विद्वान ब्राहमणोंकी सम्मति लेकर भगवानुका चरणामृत ग्रहण कर लिया । जब दुर्वासा आये तो वे इस अवज्ञाके लिए अम्बरीषपर बरस पड़े । भावावेशमें उन्हों ने अपनी जटाका एक बाल तोड़कर पृथ्वीपर पटक दिया जो कृत्या राक्षसी बनकर राजाका विनाश करनेके लिए झपटी । ठीक उसी समय सुदर्शन-चक़र प्रकट हुआ । वह कृत्याका संहार कर दुर्वासाके पीछे दौड़ा । दुर्वासा भागते हुए क्रमश ब्रहमा शिव और विष्णुकी शरणमें गये किन्तु उन्होंने उनकी रक्षा करनेमें अपनी अक्षमता व्यक्तकी । फलस्वरूप वे अम्बरीषकी शरणमें आये । अम्बरीषकी प्रार्थनापर चक्र शान्त हुआ । राजा तब तक प्रतीक्षा कर रहे थे अतएव दुर्वासाने उनका आतिथ्य स्वीकार कर भोजन किया और उनकी प्रशंसा करते हए वे अपने आश्रम लौटे । भरत जब रामको वापस लौटानेके लिए चित्रकूट गये थे उस समय देवताओंको अम्बरीष और दुर्वासाकी कथाका स्मरण कर अत्यन्त निराशा हो रही थी- सुधिकर अम्बरीष दुरवासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।। मा० अ० । यह कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है। सूरदासने भी इसका उल्लेख दुरवासाको साथ निवारथों अम्बरीष पत राखी ईश्वरकी भक्तवत्सलताके सन्दर्भमें किया हैं सू० ५४९ । कबीरके बीजकमें भी इनका उल्लेख हुआ है बीजक २५७९२ । -ज० प्र० श्री० अंबा-काशीराज इन्द्रयुम्नकी तीन कन्या ओंमें ज्येष्ठ कन्या अम्बा थी । भीष्मने अपने दो सौतले छोटे भाइयों -विचित्रवीर्य | और चित्रांगदके विवाहके लिए काशिराजकी पत्रियोंका अपहरण किया था । भीष्मके पराक्रमके कारण वे उनपर मुग्ध थी और उनसे विवाह करना चाहती थीं। किन्तु भीष्म आजीवन ब्रहमचर्यकी प्रतिज्ञा कर चुके थे अत यह विवाह सम्पन्न न हो सका । इस अपहरणकी घटनाके पूर्व इनका विवाह शाल्वके साथ होना निशिचत हो चुका था । परन्तु इस घटना के कारण उन्होंने भी अम्बासे विवाह करना अस्वीकार कर दिया । प्रतिशो धकी भावनासे प्रेरित होकर अम्बाने कठिन तपस्याकी और शिवका वरदान प्राप्त कर आगामी जन्ममें शिखण्डीके रूपमें अवतीर्ण होकर अर्जुनके द्वारा भीष्मको जर्जर कराकर बदला लिया । भीष्म इस वास्तविकतासे अवगत थे। --ज० प्र० श्री० अंबलिका-काशिराज इन्द्रयुम्नकी कनिष्ठा कन्या अम्बालिका थीं । सत्यबतीके पुत्र विचित्रवीर्य इनके पति थे और पांडु इनके पुत्र । पांडुकी उत्पत्ति व्यासके द्वारा मानी जाती -ज० प्र० श्री० अंबिका- १. संहिता अभ्बिकाको रुद्रकी भगिनी के रूपमें सम्बोधित किया गया है तथा रुद्रके साथ बलिदानका अंश ग्रहण करनेके लिए आह्वान किया गया है। मैत्रायिणी सहितामें इन्हें रुद्रकी योनि माता ? पत्नी ? भी बताया गया है। इन्हें हेमन्तके प्रतीकके रूपमें वर्णित किया गया है।




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