नीरजा - विवेचन | Nirja Vivechan

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Nirja Vivechan by सत्यपाल चुघ - Satyapal Chugh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१७९ ) कु जो के नीचे झरते हरसिंगार की छय्या पर तम और चॉदनी आलि- गन-पाद में वद्ध पड़ है और वह मघूपवन ! इसे देखो, इस लोभी ने इतने मघुका संचय किया है. कि उसके भार से इससे चला सी नहीं जाता । पर कित्तन्ग अजान, कितना निप्दुर है अपना प्रेमी जो हृदय के मानस को सूखते देख रहा है और आता नहीं । मंतर भर उठता है, दरीर सिहर उठता है और मॉसू की वू दे बरोनियो में उलझकर रह जाती है । पर इससे लाभ ? सब व्यय है । सब सारहीन ! विरह सत्य ! प्रतीक्षा सत्य है !! व्यथा सत्य है 1!!!” विशेष १--पुरूकन सिहरन तथा करते हुए मासू सार्विक अनुभाव' हूं । यह अनुभाव सारा रहस्योदूघाटन कर रदें है--मूल भाव को वता. रहे है । 'रह्मि' की इन पक्तियों से तुलना कीजिए-- “किस सुधि-वतरत का सुमन-तीर कर गया मुग्घ मानस अधीर रु >६ 9६ संजरित नवल मृदू देह डाल खिल उठता नव पुछूक-जास मघु-कन सा छलक नयन-नोर रद रद ज * अलि सिहुर-सिहर उठता शरीर २... 'बुनते जाली'--की तुलना प्रसाद के 'आँसू' की निम्न पंक्तियों से की जा सकती है :-- लिपटे पड़े सोते थे सन में सुन्न-दुख दोनो ही. एऐंसे चन्द्रिक श्रंघेरी मिलते _ सालती फुज में जैसे” १. विदवम्भर “सानवों व




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