अनुभव - प्रकाश | Anubhav Prakash

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Anubhav Prakash by लालजीराम शुक्ल - Laljiram Shukl

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अन्ुभव-प्रकाश समाज की सेवा करे । जिस व्यक्ति की भावना सदा देने की ही रददती है लेने की नहीं वही आत्म-निभेर हो सकता है । _. झत्येक सचुष्य स्वतन्त्रता का इच्छुक हैं। खतन्त्रता संसार की सबसे कीमती वस्तु हे । यह सखतन्ब्रताकी इच्छा धर्म का रूप धारण करती है । बिना सतब्यताक नेतिक जीवन का कोई अथ नहीं । परतन्ञ्र व्यक्ति वाहे जितना सदाचारी हो उसके सुक्मोंका श्रेय उसे नहीं । उसके सदाचार अथवा दुरायार का अधिकारी उसका मालिक रहता है। अपने व्यावहारिक जीचनमें आत्म-निभर रहना इस स्वतस्थता पघाधि की पहली सीढ़ी है । अस्तु आत्स-निर्भरता धार्मिकता की मित्ति है | . आत्म-निभेरता कसर प्राप्त की जाय ? प्रत्येक बड़े कामका प्रारम्भ छोटे-छोटे प्रयलोसे ही होता है । सदा प्रयस्न करने पर मांगे मिल जाता है । जो मनुष्य एकाएक मागे पा लेना चाहतां हैं उसे अवद्य निराशा होती है। यहाँ पर कुछ आत्म-निमरता झाप्तिके सावन बताये जाते हैं । प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें अपने थरुअचकी कसोटी पर कसना चाहिये । आत्म-निश्नेरता--घाधिका पहला साधन नित्य उद्योग है। प्रत्येक मनुष्य को सदा कुछ न कुछ उद्योग सें लगा रहना चाहिये । सचुष्य का व्यक्तित्व जड़ और चेतन के सेल से बना है । जड़ता हमें अजुयोगी बनाती है वह हमें जड़ पदार्थ के समान निष्क्रय करती है। इसके प्रतिकूल सेतन्यता मन में काम करने की स्फूर्ति पैदा करती हे । कुछ न करने वाले व्यक्ति से क़छ न कुछ करने वाला अच्छा दे । जैंसे बहती नदी का जक सच्छ होता हे वेसे नित्य उद्योगी मछुष्य का जीवन निर्मल होता है। सब प्रकार के सद्यु्णों का आश्रय उद्योग-दौलता ही है | जद्योगी पुरूष ही अपने आपका तथा दूसरोंका कब्याण कर




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