भड़ामसिंह शर्मा | Bhadamasingh Sharma

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Book Image : भड़ामसिंह शर्मा  - Bhadamasingh Sharma
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भड़ामसिंह राम“हाफ्जा गर वरल ख्वाही सुलह कुन बा खासो आम |वा मुसलमा अल्‍्छा अव्छा वा बरहमन राम राम ॥?””बह शादी रात है !दो झादमी यह सुनते दो चोंक पड़े और जिधघरसे यह आवाज़ आई थी, उघर ग़ौरसे देखने क्गे। एक झझादमीका ढांचा एक कोनेमें सिकुड़ा-सिकुड़ाया पुलिन्देकी सूरतमें कुछ गड़बढ़सा दिखाई पढ़ा। रोशनी इस कम्नाट्मेंटमें ठोक नहीं पढ़ती थी । एक तो यों दो अंघियाकी थी । उद्रपर आधी सूरत । मुंदकी जगद खाक्ी चाँद घुटी खोपड़ी नजर श्राती थी । इचलिये इनकी शकलकी इुक्षिया लिखना अभी जरा टेढ़ी वीर है। दोनों इघर देख ही रहे थे कि सामनेकी बंचपरस्रे तीन झादमों एकबारगी योक्ष उठे ।




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