उत्तर रामचरित्र नाटक | Uttar Ramcharit Natak

Uttar Ramcharit Natak by सत्यनारायण कविरत्न - Satyanarayan Kaviratn

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उत्तर रामचरिश्रं भूमिका । ९. धे-सुहदसा-वादे कुछ भी उपकार न करे . किंतु. थे..अपडें सुहद को अठौकिक वस्तु समझते हैं गदूगद्‌ साव .पूरित आपको थी कथन हैं किन यस कट न करे तड संधदा बसि समीप संबे विपदा हरे सुहद जो कई जासु जद्दानमें अवासि सो तिहि जीवन सूरि है ॥ ६-५ ससे. अत्यंत . सूक्ष्म एंव. स्पष्ट रुप. से. . अलुभूत . होनी चाहिये । उक्त भिन्न २ चूत्तियों का. विषय इंद्रियंगोंचर होते. थी यह है कि कवि को हृदय ऐसा . होना चाहिये. जिसमें मिंन ... मनोधुश्तियां पूर्ण रूप से प्रतिविस्वित हो जांय। यह नियम . भेवरसूर्ि .. पं प्रेमी है बसे ही स्वभाव नितीत संरख अथच गम्भीर दोें कें . सादक में राम चासती संम्यांद छव चंद्रकूजु बातालापं संथीं शभ पनमस की शुद्धत। -बहुतेरे युसोपियन विद्वान संस्कृत कविता को. सदद दोद लगाते हैं कि. उसमें श्ंगार का चंदुभत्र-छुद्ध मेरा किस पनसहदयता-कबि का प्रधान शुण सहदयता है । कूदय ई की... शइंगार बोर करुणादि जो सिन्न सिन्न बृत्तियां हैं. वे... कंबि की मेन छुन्ध की जाता है. और उस झुब्धता के आधिग मैं ... संसके सुखं से जो बातें निकछंती हैं बददी यथा कविता है। तार्ये ..... ... की कंबिता में सचेत्र चरितार्थ दो रहा है उनका मन अल्पत नि्मेदी . कारण जिस संग का श्लोक देखियें मानी बंद रस उससे पका पढ़ता है । इससे विदष परिचय प्राप्त करने के छिए उत्तर शासित व कुद सम्मेखच आदि का बंणेने पढ़ना छावित अतीत होती है।




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