बापू की प्रेम प्रसादी | Bapu Ki Prem Prasadi

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Bapu Ki Prem Prasadi  by घनश्यामदास बिड़ला - Ghanshyamdas Bidla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना गाधौजी पतच व्यवहार में बहुत ही नियमित थे । पत्न-व्यवहार वे द्वारा ही वे असब्य लोगा स हार्दिक सम्बंध रख सकते थे और उह जीवन मे ऊचे आदश सिद्ध करने के लिए प्रेरित करते थे । जिसके साथ सम्य ध भाया उसके 'यक्तिगत जीवन मं हृदय से प्रवेश पाना उसकी योग्यता उसवी खूबी जौर उसकी गहराई को समसकर उसके विकास मे मदद देना, यह थौ उनके पत्न-व्यवहार की विशेषता । गाधीजी का पत्न-साहित्य उनके लेखा और भाषणों के जितना ही महत्व का है। उनवे' “यवितत्व को समझने के लिए उनका यह पत्र साहित्य बहुत ही उपयोगी है। मैंने देया है कि पत्नो म उनकी लेखन शली भी अनोपी होती हू । ससार में शायद ही ऐसा कोई नेता हुआ होगा जिसने अपने पीछे गाधीजी ये जितना पतन व्यवहार छोड रखा हो । गाधीजी का पत्र यवहार पडते समय मृज्ञे हमेशा यही प्रतीत हुआ है, माना मैं पदिप्त गगाजी मे स्नान जीर पान कर रहा ह । मुक्षे उस्म हमेशा पवित्रता भौर भरसनता का ही अनुभव टमा है । उसके इद गिद का वायुमडल परावन, प्राणदायी योर्‌ प्रशमकारी ६1 दसीलिए जब श्री धनश्यामदास पी विडला न गाधीजी के साथ का अपना पत्न-व्यवहार मेरे पास भेज दिया तो सुझे बडा जान ह हुआ नौर उत्साह के साथ मैं उसे पटने लगा। जसे-जैसे पढ़ता गया वसे वसे स्पप्त होता गया कि बह बेवल पने्यामदासजौ नौर गाधीजी के बीच वा हो पत्र यवहार नहीं है। इसम ता गाधीजी के अभिन साथी स्व ० महादेवभाइ देसाइ और घनश्यामदासजी मे” बोच का पत्तःव्यवहार हौ सवम अधित है। इसके अतिरिवन गाधीजी के जय साथिया, देश ब बर्ड नताओ और मायकर्ताओ अग्रज वाइसराया जौर कूटनीतिनः मैः साय वा पत्न-व्यवहार भी है और उनकी मुलावाता वा विवरण भी । सक्षेप म--हमारे युग का एक महत्व वा इतिहास इसमें भरा हुआ हैं । यह्‌ दपकर मेर मुह ते उद्गार निवल पडा माय 1 यहं सारी सामग्रौ पाच साल पटले मर टायामे आत्ती।'




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