प्राकृतिक जीवन की और | Prakritik Jivan ki Aur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकृतिके बोल ३ के वोरुपर ध्यान न देना । हम उसकं प्रत्येक नियमको कूचर्ते चरते हं । हम उसके बताये रास्तेसे भटके हए ह्‌ । परकृतिकी न्याय-परायणताके औचित्यके संबंधमें दो मत नहीं हो सकते । जहां वह अपना कोई भी नियम भंग करने- वाले अपराधीको दंड देती हैं, वहां उसके नियमानुसार चलनेपर वह पुरस्कार देना भी नहीं भूलती । कंसा भी कोई रोग क्यों न हो मनुष्य उससे मुक्त होनेका अधिकारी हे, अपनी «नियत , प्रसन्नता प्राप्त करनेका हकदार ह । एकमात्र मार्ग उसका यही है कि वह ईमानदारीसे प्रक़ृतिकी रारण जाय । उसे प्रकृतिके बोलॉपर चलनेकी हर तरहसे कोशिश करनी चाहिए । भोजन उसे वही ग्रहण करना चाहिए जो प्रकृतिमाताने उसके लिए अपने हाथों पकाया है। उसे जल, वायु, आकाश, पृथ्वी ओर प्रकाशसे प्राकृतिक संबंध जोड़ना चाहिए । प्रकृतिकी भाषा अत्यंत सुबोध हे, वह्‌ अपने आदेश सव प्राणियोको--पदु ओर मनुष्य दोनोको बहुत स्पष्ट रूपसे देती हं । प्रकृतिकी कभी यह्‌ इच्छा नहीं रही ह॑ किं मनुष्य जीवनके सच्चे रास्ते ओर स्वास्थ्य-पराप्तिकी सरक पद्धतिके संब॑धमें इतना अनभिज्ञ ओर इतना परेरान रहे कि उसे अपने साथियों - से इन नियमोपर वाद-विवाद करना प्रडे ओर अपनी अन- भिन्ञताके कारण उसे चिता ओर शंकाका शिकार बनना पड़ । अव हम मनुष्यसे रिक्षा न लेकर प्रकृतिकी सीख सुनेंगे । प्रकृतिके सिखावनके ढंग कुछ निराले हुं । उसकी रिक्षा




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