प्राकृतिक जीवन की ओर | Prakratik Jivan Ki Or

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्राकृतिक स्नान १७ इसलिए मेरी पहली कोशिश यही हुई कि मै स्वय पहले प्रकृति से जल के सही प्रयोग सीखू । इस कोशिश मे मैंने महसूस किया कि मेरी भतध्वेनि, जिसे नैंसगिक प्रवृत्ति कहना चाहिए, जल के किसी खास प्रयोग के लिए श्रेरित नही कर रही है। पर मुझे कुछ वनवासियो से ज्ञात हुआ कि प्रकृति के प्रागण मे विचरनेवाले पशु, जो अपने सारे कार्य नैसगिक प्रवृत्ति के अनुसार करते हैं, स्नान के विषय में कुछ खास नियम बरतते हैँ । मैने उनकी आदतो का श्रध्ययत करना आरंभ किया और इन तथ्यों पर पहुंचा । नदी से क्ुदकर और सारे बदन को धो-धोकर नहाना प्रकृति के _ अनुकुल नही है। नदी अ्वथा टब में नहाते वक्‍त सारे बदन को भिगोना प्रकृति के विरुद्ध है । धरती पर विचरनेवाले पयु नहाते वक्त सारे बदन को भिगोना नापसद ही नही करते वरन्‌ ऐसा करते घवराते भी हैं । अश्रगर आप किसी पयु (खास तौर से बदर) को पानी मे उछाल दे तो देखेंगे कि वह बडी आतुरता से किनारे पर पहुंचने की कोशिश करता है । ऐसा प्रतीत होता है कि सभी पद्यु बडी अ्रनिच्छा से और सो भी दवाव पड़ने पर ही स्नान करते है। अ्प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने के आदी घरेलू पश्ुश्रो मे से इवके-दुवके पानी से प्रीति करनेवाले मिल जये तो उन्हे नियम का अपवाद ही समझना चाहिए । देखा यहं जाता है किं पृथ्वी पर विचरण करनेवाले उच्च प्रकार के पशु (स्तनपायी पयु), खास तौर से जंगली सूअर और हिरन, युक्त भ्रकृति के साथ (जगल मे) रहते समय भ्रादतन छोटे पकरिल




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