धर्मपरीक्षा | Dharm Pariksha

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Dharm Pariksha by बालचंद्रजी शास्त्री - Balchandraji Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना घर्मपरीक्षा १. हस्तलिखित प्रन्योंकी संकलित सूची देखते समय धर्मपरीक्षी नामक जैन प्रन्योंकी एक बहुत बड़ी संख्या हमें दुष्टिगोचर होती है। इस लेखमें हम विद्वेषतया उन्ही धर्मपरीक्षाओंका उल्लेख कर रहे हैं, जिनकी रचनाओंमें असाधारण अम्तर है । | १) हरिषिणकृत धर्मपरीक्षा--यह अपभ्रंश माषामें है और हरिषेणने सं, १०४४ (-५६ सन्‌ ९८८) में इसकी रचना की है। [२1] दूसरी धर्मपरीक्षा अमितगतिकों है। यह माधवसेनके शिष्य थे । ग्रन्थ संस्कृतम है और सं. १०७० ( सन्‌ १०१४ ) में यह पूर्ण हुआ । [३] तीसरी धमंपरीक्षा वुन्तविलासकी है। यह कन्नड़ भाषामें है और ११६० के लगभग इसका निर्माण हुआ है । [४] चौथी संस्कृत घर्मपरीक्षा सौभाग्यसागरकी है । इसकी रचना सं. १५७१ (सन्‌ १५१५) की है । [५] पचवी संस्कृत घर्मपरीक्षा पश्मसागरकी है । यह तपागच्षछठीय धर्मसागर गणीके शिष्य थे । इस ग्रन्थको रचना सं, १६४५ ( सन्‌ १५८९ ) में हुई । [६] छठी संस्कृत धर्मपरीक्षा जयविजयके दिष्य मानकिजय गणीकी है, जिसे उन्होने भपने शिष्य देवविजयके लिए विक्रमकी अठारहवीं शताब्दीके मध्यमें बनाया था । [ ७. सातवीं घर्मपरीक्षा तपागच्छोय नयविजयके शिष्य यशोविजयकी है । यह सं. १६८० में उत्पन्न हुए थे और ५३ वर्षकी अवस्थामें परलोकवासी हो गये थे । यह प्रस्थ संस्कृतमें है ओर वृत्ति सहित है । [८ 3 आठवीं धर्मपरी क्षा तपागच्छीय सोमसुन्दरके शिष्य जिनमण्डनकी है । (९. नवीं धर्मपरीक्षा पादर्वकीतिकी है । [१०] दसवीं धर्मपरीक्षा पूज्यपादकी परम्परागत पदथ्मनन्दिके शिष्य रासचन्द्रकी है जो देवचन्द्रकी ्रार्थनापर बनायी गयी । यद्यपि ये हस्तलिखित रूपमें प्राप्य हैं और इनमें-से कुछ अभी प्रकाशित भी हो चुकी हें। लेकिन जबतक इनके अन्तर्गत विषयोका अन्य ग्रस्योके साथ सम्पूर्ण आलोचनातमक तथा तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया गया है तबतक इनमें-से अधिकांश हमारे छिए नाममात्र ही हैं । २. यह्‌ अमितगतिकौ धर्मपरीक्षा है, जिसका पूर्ण रूपये अध्ययन किया गया है। मिरोनोने इसके विषयोंका सविस्तर विदलेषण किया है । इसके अतिरिक्त इसको भाषा और छम्दोंकि सम्बन्धमें आलोचनाहमक रिमार्क भी किये हैं। कहानीकी कथावस्तु किसी भी तरह जटिल नही है। मनोवेग जो जैनधर्मका दुढ़ दानी है, अपने मित्र पवनवेगको अपने अभीष्ट धर्ममें परिवर्तित करना चाहता है और उसे पाटलिपुत्रमें ब्राह्मणों की संभामें ले जाता है। उसे इस बातका पक्‍का विश्वास कर लेना है कि ब्राह्मणवादी मूर्ख मनुष्योंकी उन दस १, अनेकान्तं बर्ष ९, कि. १, प, ९ आदि से काभार खदष्टेत !




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