त्रिषष्टिशलाका पुरुष - चरित्र | Trishashtishalaka Purush - Charitra

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Trishashtishalaka Purush - Charitra by कृष्णलाल वर्मा - Krishnalal Varma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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{ १६1 २ दुसरे पर्वमे तीर्थकर अजिवनाथजी और चक्रवर्ती सगरके चरित्र हैं । ३. वोसरे पवमें आठ तीर्थैकरोंके (समवनाथजी, 'झभिनन्दन जी, सुमतिनाधजी, पद्मम्रमुजी, सुपार््वनाथजी, चन्द्रमभु जी, सुविधिनाथजी 'और शास्तिनायजीक ) चरित्र हैं । ४ चौथेपर्वमे ४ तीर्थकरोंके ( श्रेयासनाथजी, वासुपूज्बजी, बिमलनाथजी, '्नंतनाथजी, और धघर्मनाथजी के, ) दो चक्र- वर्तियोफे ( मघवा और सनतछुमारके, ) पाँच बासुदेवॉकि ( त्रिपूष्ठ, द्विपृष्ट, स्वयंभू , पुरुपो्तम व पुरुपसिंहके ) पाँच प्रतिवासुदेवोंके ('श्वमीव , तारक, मेरक, मधु 'और निष्कमके) और पाँच बलभद्रों के (अचल, विज्ञय, भद्र, सुप्रभ व सुर्शनके) चरित्र हू । ५ पाँचये पर्वमें तीर्थंकर श्रीशातिनाथजी और चव श्रीशातिनाथजीके चरिय ह 1 ( चक्रवर्ती शातिनाथजी द्री अत मे उसी भवमे तीर्थकर भी हुए हं । एक ही जीव एकी भवर्मे दो शलाका पुरुष हुआ है । ) ६. छे पवेमे चार तोर्थकरोके ( कुथुनाथजी, श्रगनाथजी मल्लिनायजी और मुनिसुन्रतस्वामीके ) चार चक्रवर्तियों के (कुधुनाथजी, अरनाधनी, सुमोम और पदाफे ) दो वासुदेवों के ( पुरुपपुण्डरीक श्योर दृत्तके ) दो अतिवासुदेवोंके ( वलि ओर प्रहलादके ) 'शर दो बलमद्रोके ( आनन्द और नन्दनके ) कुल चौददद शलाका पुस्पॉंफे चरित्र ह। ( इनमेसे कु थुनाथ जी श्रौर च्ररनाथजी प्यहो मननं चत्त भी छुए और ती्थ- प्रभी हण दुसल्ित्जोव यारटदीष्‌ 1)




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