संवाद संग्रह | Sanwad Sangrah

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Sanwad Sangrah by कृष्णलाल वर्मा - Krishnalal Varma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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-०-००८५-००००००००+००००००००००००००५-०००००००००-२०-०००००००००००००-०००००० ५३ मटारानी मीनलदेवीका न्याय गरीब--महारानीजी | आप जैसी न्‍्यायी और भपजाहित करनेवाली ठेवी कभी जोर-जुल्म न करेगी। यह मुझे विश्वास हैं। मेने यह भी स्थिर कर रखा है कि जान दूँगी, मगर भ्रीपही न ढूँगी। महारानी--थाई ! तुमने तो मुझे बढी चिन्तामें डाल दी! बताओ तुम ऐसी हठ क्यों कर रही हो १ तुम उद्ध हो चली ही तुम्हारे पीछे कोई नहीं है | इस लिए आज नहीं तो कुछ दिन बाद यह जगह सरफारी ही होगी। ऐसी दशामें क्या यह उचित नहीं है, कि तुम खुद ही झोपड़ी दे दो । निससे यहा तालाब पकसा सुंदर बन जाय । गरीब--महारानीजी ! आप कहती हैं से। सय ठीक है; परन्तु क्‍या मै आपसे छुउ पूरे ? महारानी--होँ पूछो । गरीब--आपके एक पुत्र रन्‍न है | आपको फक्िसी वातकी' कमी नहीं है। तो भी आप यह तालाय क्यो वनवाती हैं १ महारानी--इसलिए फ्रि, प्रजाझा हित हो और भ्रेरा नाप हमेशा कायम रहे | गरीब---यदि आप मुझे अभय वचन दें तो में अपने मनडी यात कई | महारानी--प्रीनलदेवी भमाफों हमेशा ही निर्भय रखती है |. तुम जो कुछ सत्य यात हो से कहे |




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