हिंदी निबन्ध | Hindi Nibandh

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Hindi Nibandh by प्रभाकर माचवे - Prabhakar Machwe

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ त्रा जाता हो। रूस की माया रूस ही जाने, . विषय को यहीं, समाप्त करं | मेरी यह पुस्तक हिन्दी निबन्ध पर कोदईं॑विदरतापूरं खोज-ग्रन् नरह, न श्रम्तिम शब्द होने का मेरा दावा है | मेरा प्रयास हे कि कुछ तथ्य, जो मुझे श्रपने पढ़ने लिखने के सिलसिले में इस्तगत हुए, मैं श्रन्य सहदर्यों तक पहुँचाएँ । साहित्य का सत्य किसी एक व्यक्ति या गुर की मोनोपोली नहीं है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि वह श्रस्तत। जीवन का सत्य है, नो नित्य गतिशील, निरन्तर भूयमान है । गति का श्राधिक्य कभी-कभी स्थिति का श्राभास पैटा करता है, पर जसे मैंने श्रपनी निशन्धों की पुस्तक खरगोश के सींग” में कहा हैं श्राभास को सचाई मानलेने का हमारा बाल-स्वभाव सावजनीन हे। नई टिल्ली ५-४-५५ प्रभाकर माचवे




User Reviews

  • ajabirali07

    at 2019-06-09 05:06:28
    Rated : 8 out of 10 stars.
    "C.I.D"
    JABIR ALI C.I.D
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