जैन शिक्षा दिग्दर्शन | Jain Shiksha Digdarshan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जैन शिक्षा दिग्दर्शन  - Jain Shiksha Digdarshan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about विजयधर्मेसुरि - Vijaydharmesuri

Add Infomation AboutVijaydharmesuri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
-श्युभाश्युभ कल कैसे प्राप्त होता है? । वह भी इस तरहडो सकता दहै कि-बीतराग के भक्त देवताछोक राग-द्वेषवाङे होने से पजकपर प्रसन्न ओर निन्दकपर अप्रसन्नहोते दे; इसलियि वे देवता वीतराग की पृजाके निमित्त | से जो फल देते हैं वह वबीतराग से ही प्राप्त होता हे; >यदि आरोप से ऐसा मान ले तो उसमें कुछ भी हानि नहीं हे। अदन्त देव में राग,* द्वेष, अज्ञान, मिथ्यात्व, दाना- -न्तराय, खाभान्तराय, बीर्यान्तरायः, भोगान्तराय, उपभो- -गान्तराय, हास्य, रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, कामः; निद्रा ओर अविरतिरूप अटारह दूषणो का अभाव हे।यद्यपि राग, द्वेष; मिथ्यात्वं ओर अज्ञान रूप चार.ही दूषणो के नादा होने पर प्रायः सभी दूषण नष्ट हो- ८. ज्ञाते 2, किन्तु बाख्कों को सर रूप से इश्वरसबन्धी ` । `“ज्ञान कराने के लिए विल्येष विस्तार क्रिया गयादहै।1 ` ओर कायरूप दानान्तरायादि चौदह इषणो के दृष्टिगो- चर होने से राग्द्वेषाडि चार कारणरूप दोषों का अनुसमान किया जा सकता हे; क्योंकि कार्य से ही कारणका ` अनुमान किया जाता है | जैसे कोठरी के भीतर बेठा हि :.... हुआ पुरुष वृष्टि के देखने से आकाशस्थ मेघ का अनु- `` ` मान करलेताहै। न . .* अन्तराया दानदाभवीर्यभोगोपभोगगाः .. ध` -:. ` हासो रत्यरती भी तिज्ञुगुप्सा शोक प्व च ॥७२।॥ जकामो मिथ्यात्वमज्ञानं निद्रा चाविरतिस्तथा। ` : रागो द्वेषश्च नो दोषास्तेषामष्टादल्लाप्यमी ॥७३॥ ५ ( हेमकोश, देवाधिदेवकाण्ड, १० २३ )




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now