शिक्षण सिद्धान्त की रूप रेखा | Shikshan Sansthan Ki Roop Rekha
श्रेणी : साहित्य / Literature

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Add Infomation About. Dr. Saryu Prasad Choubey
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
43 MB
कुल पष्ठ :
340
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)४] ˆ रि्तण-मिद्धान्त कौ रूप-रेखा
६ १ दि ह
बिना शिक्षा के सम्भव नहीं । कुछ व्यक्ति मुखं हो जाति हैः
क्योंकि उन्हें मुख बनाया जाता है । उनकी शिक्षा की व्यवस्था
'नहीं हो पाती, इसलिए संक्रमित गुण रखते हुये भी वे पोछे
रह जाते है। प्रजातन्त्र राज्य में व्यक्ति की «ऐसी स्थिति
'झपेक्षित नहीं । इसमें आगे बढ़ने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को
समान अवसर देने का प्रयत्न किया जाता है । स्पष्ट है कि
शिक्षा का एक सामाजिक उद्देश्य है । इसका व्यक्तिगत उद्देश्य
नहीं होता । समाज के विभिन्न व्यक्तियों की अआवश्यकतालुसार
विकास की व्यवस्था करना शिक्षा का प्रधान कत्त व्य है ।
२३--शिशा-उद श्य में समाज-गति के अनुसार परिवर्तन:--
व्यक्ति तथा समाज की आवश्यकता परिस्थिति शनुसार
बदला कसती है, क्योकि संसार परिवतनशील है। अत.
शक्ता व समाज एक रन्ता का कोई शाश्वत उदेश्य नि वो
निर्भर रित नहीं किया जा सकता । इसमें
'दूसरे पर › नये
देश-काल के अनुसार परिवर्तन राता
ही रहता है। स्पष्ट है कि इसीलिये
किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था के
झध्ययन से वहाँ की सभ्यता का अनुमान लगाया जा
सकता है । किसी देश की शिक्षा व्यवस्थ। कभी गलत नही
हुआ करती । वस्तुतः उस देश की सामाजिक अवस्था ही वैसौ
होती है। समाज की जैसी माँग होती है उसी के श्रनुसार
शिक्षा का आयोजन रहता है । यदि शिक्षा व्यवस्था के बदलने
को आवाज उठाई गई तो इसका अर्थ यह है कि सामाजिक
अवस्था भी बदल रही है । अतः शिक्षा का रूप तब तक नहीं
ध्दला जा सक्ता जब तक देश की सामाजिक स्थिति में स्वयं
कु परिवतेन न श्रा गया हो । इस प्रकार शिक्षा ओर समाज
भारत में शिक्षा का
दृष्टिकोण ।
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