कबीर उपदेश | Kabir Updesh

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Kabir Updesh by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ठाकुरदासविरिचित । ९ जव तुम रहे अकेल गोसांइ । नारि पुत्र नाहीं जन्माई ॥ केसे खेत बीज विस्तारा । केसे अपना रुप संवार ॥ कोने कथी देदकी बानी । कौने जोत पुरुष पहिंचानी ॥ तुरुक किताव कहांसे आवा । को विद्विश्त वेकुंठ बनावा ॥ निगुण यह विधवचन कौन उच्चारा॥ कोन नाम है सिरजनहारा । कौन नाम है प्राण अधारा ॥ एकेत दूसर किन कोन्हा । इन सब केसे तुमद्दी चीन्हां ॥ साखी । तुम बढ़ ज्ञानी पुरुष हो बचन कहों समुझाय ॥ त्रयदेवा प्रलय गये तुम कहां रहे समाय ॥ सतगुर बचन। रमेंनी । अरे साह हम तहां रहाई। जम प्रवेश तहां सपनेहु जाके डर कांपे जमराइं। अडी साहु दम तिन गुणगाई ॥ तीनलोक जब परलय होई। चोथलोक सुख सदा समभोई॥ पिरथीआदि मोर अस्थाना । जब अकेल हम रहे निदाना॥ अगृतरुपी हमरी देहा । मोजनका मोहिं कोन सनेहा ॥ सब जग हसा रहे अकेला । इच्छा मई आपसे मेला ॥ मायारूप नारि दोय॑ आईं । स्वाती बीज वीज जिमि पाई॥ नाद विंदु एक संग समाना । तीन देवता उपने आना ॥ सब मिल आपन रचना ठानी।वेद किताबसबकीनबखानी दू तुरुक भये संसारा । रचे पुरान कोरान असारा ॥




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