कबीर उपदेश | Kabir Updesh

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutKhemraj Shri Krishnadas
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2.38 MB
कुल पष्ठ :
80
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ठाकुरदासविरिचित । ९ जव तुम रहे अकेल गोसांइ । नारि पुत्र नाहीं जन्माई ॥ केसे खेत बीज विस्तारा । केसे अपना रुप संवार ॥ कोने कथी देदकी बानी । कौने जोत पुरुष पहिंचानी ॥ तुरुक किताव कहांसे आवा । को विद्विश्त वेकुंठ बनावा ॥ निगुण यह विधवचन कौन उच्चारा॥ कोन नाम है सिरजनहारा । कौन नाम है प्राण अधारा ॥ एकेत दूसर किन कोन्हा । इन सब केसे तुमद्दी चीन्हां ॥ साखी । तुम बढ़ ज्ञानी पुरुष हो बचन कहों समुझाय ॥ त्रयदेवा प्रलय गये तुम कहां रहे समाय ॥ सतगुर बचन। रमेंनी । अरे साह हम तहां रहाई। जम प्रवेश तहां सपनेहु जाके डर कांपे जमराइं। अडी साहु दम तिन गुणगाई ॥ तीनलोक जब परलय होई। चोथलोक सुख सदा समभोई॥ पिरथीआदि मोर अस्थाना । जब अकेल हम रहे निदाना॥ अगृतरुपी हमरी देहा । मोजनका मोहिं कोन सनेहा ॥ सब जग हसा रहे अकेला । इच्छा मई आपसे मेला ॥ मायारूप नारि दोय॑ आईं । स्वाती बीज वीज जिमि पाई॥ नाद विंदु एक संग समाना । तीन देवता उपने आना ॥ सब मिल आपन रचना ठानी।वेद किताबसबकीनबखानी दू तुरुक भये संसारा । रचे पुरान कोरान असारा ॥
User Reviews
No Reviews | Add Yours...