हिंदी व्याकरण | Hindi Vyakaran

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Hindi Vyakaran by पं. कामताप्रसाद गुरु - Pt. Kamtaprasad Guru

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ११ ) हिंदी-भाषा के आरभ-काल में, समय समय पर ( प्रायः एक एक शताब्दि में ) बदलनेवाले रूपों और प्रयोगों के प्रामाणिक उदाहरण, जहाँ तक हमें पता लगा है, उपलब्ध नहों हैं। फिर इस विषय के योग्य प्रतिपादन कर लिए शब्द-शा की विशेष योग्यता कीमी आवश्यकता है। ऐसी श्रवस्था में हमने 'हिंदी-व्याकरण” में हि दो-भाषा के इतिहास के बदले हि दी-साहित्य का संक्षिप्त इतिहास देने का प्रयत्न किया है। यथार्थ मे यह बात अनुचित और झ्रनावश्यक प्रतीत होती है कि भाषा के संपूर्ण रूपों श्र प्रयागे। की नामावली क॑ स्थान में कवियों कौर लेखकों वथा उनके ग्र॑थों क्री शुष्क नामावली दी जाय । हसने यह विषय कंवल इसीलिए लिखा है कि पाठक को, प्रस्तावना के रूप मे, अपनी भाषा कौ महत्ता का घोड़ा-त्रहुत अनुमान हो जाय । हिंदी क॑ व्याकरण का सर्व-सम्मत द्वाना परम आवश्यक है । इस विचार से काशी की सभा ने इस पुस्तक को दुद्दराने के लिए एक संशाधन-सलमिति निर्वाचित की थी। उसने गत दशहरे की छुट्टियां मे अपनी बैठक की, श्रौर आ्रावश्यक ( कितु साधारण ) परिवत्तन के साथ, इस व्याकरण का सर्व-सम्मति से स्वीकृत कर लिया । यह बात लेखक, दिदो-भाषा श्रौर हिदो-माषियां के लिए अत्यंत लाभदायक और महत्त्व-पूणे है। इस समिति के निम्न- लिखित सदस्यो ने बैठक मे भाग लेकर पुस्तक फे संशोधनादि कार्यो मे अमूल्य सहायता दी है-- पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी । «५ साहित्याचाये पंडित रामावतार शर्म्मा, एम० ए० | पंडित च॑द्रधर शमां गुलेरी, बी ए० 1 रा० सा० पंडित लज्नाशंकर का, बी° ए० । पंडित रामनारायण मिश्र, बी० ए०।




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