अपनी दुनिया | Apni Dunia

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Apni Dunia by पं. कामताप्रसाद गुरु - Pt. Kamtaprasad Guru

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपनी दुनिया [ १७ भम श ९../ ९ बे-तुरी है। शहनाई से देहाती गीत बार-बार गाई जा रही है | ढोलक- झल की आवाज आकाश को सिर पर उठाने का दावा करती ই? श्रीमती निश्चरेणी ने समझा--पासही में कहीं शादी का समारोह है। उसने नाठकीय ढंग से खिड़की से सिर निकाल पेड़ों से ढके हुए किनारे की ओर उत्सुकता से भरी नज़र डाली । धाट पर बँधी हुई नाव के माँझी से मैंने पूछा--क्यों जी, वहाँ बाजा थो बज रहा है माँझी ने कहा--भआज ज़मीदार का पुण्याह ই! पुण्याह का अर्थ विवाह नहीं है । अतः यह सुनकर निश्चरिणी देवी के चेहरे पर मायूसी छा गयी । वह पेड़ों की छाबमें ग्रामीण वर वधू को देखने के लिए उत्सुक थीं-। मैंने कहा--पुण्याह का अथ ज़र्मीदारों के सम्बत का पहला दिन है ¦ आज प्रजा कुछ न कुछ माछंगुजारी ले जाकर छावनी में वर वेशधारी कारिन्दे को देगी | यह रकम उस दिन गिनना मना है। यह प्रथा वैसी ही है, जैसे वृक्ष आनन्द पूर्वक वसन्त को पुष्पांजलि भेठ करते हैं । प्रकाशवती ने कहा-माल्युजारी अदा करने के अवसर पर ब.जे-गाजे की क्या जरूरत है ? श्रीमान्‌ प्थ्वीराज ने कहा--प्रजा तो बलिदान का बकरा है। बकरे को बलछि देते समय क्या ग।जे-बाजे नहीं बजते हैं ? आज मालगुजारी देवी के समीप बलिदान का बाजा बज रहा है| मैंने कहा---ऐसा खयाल तुम छोगों का हो सकता है; किन्तु मेरे खयाल में तो यदि देना ही हो, तो एकदम पशु-हत्या की तरह न देकर उसमें जितना ही ऊँचा भाव रखा जाय, उतना ही अच्छा है | श्रीमान्‌ पृथ्वीराज ने कहा--मैं तो इस बात का कायल हूँ कि ~~~ ~+




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