भक्ति का विकास | Bhakti Ka Vikas

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Book Image : भक्ति का विकास  - Bhakti Ka Vikas

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आदित्य नाथ - Aaditya Nath

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मुंशीराम शर्मा - Munshiram Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ७ ) काल को वन्दी बना छेता है भीर मृत्यु को भी मार टालता है। इसी की सतत बतमानता मृत्यु से अतिक्रान्त भमृतत मवस्था , क्षि सपन ओौर साध्य द्विविष रूप वालों हैं। साधक साधन में दी जब रस छेने ভরাট, तब उप्तके फर्लो की শীত উ তনাজীন হী আনা हैं। यद्दी सापन का साध्य ঘন जाना है। पर प्रत्येक साधन का अपना पृथक फल है। भक्ति भी साधक को पूर्ण स्वापीनता, पवित्रता, एकल्व भावना तथा प्रभ्ञुपाप्ति जैसे मधुर फछ प्रदान करती है । प्रमुप्राप्तिका अर्थ जीव की समाप्ति नहीं है, सथुजा और सखा भाव से जीव का अपने स्वरूप में अवस्थित होकर आनन्द का उपभोग करना है । : , शन तीन अध्यायों की सामग्री वैदिक भक्ति के लिये पृष्ठभूमि का काय॑ करती है, . जिसका निरूपण चतुर्थ अध्याय में किया गया है। वेद ईश्वर के निरपेक्ष तथा सापेक्ष सरूप के सम्बन्ध में क्या कहता है, उसमें किस प्रकार की प्रार्थनायें हैं, प्रभु से विलग . होकर मक्त के हृदय से कैसा कातर ऋन्‍्दन লিদ্দতবা है, आत्मनिवेदन, विनयमक्ति की भूमिका तथा परवर्ती भासक्तियों का वेद में कितना, और कैसा उछेख है, प्रभुप्राप्ति कै लिये वेद ने किन साधनों का वर्णन किया है और अन्त में वह श्न साधनों से उपलब्ध जिन सिद्धियों का प्रतिपादन करता है, उनमें कौन-सी विशिष्टता है--इन सभी प्रसंगों . का वैदिक ऋचाओं के माध्यम द्वारा उद्घाटन किया गया है। देद में प्रतिमा-पूजन का विधान नहीं -है। वेदिक मक्तिपडत्ति साधक वो कर्मकाण्ड के साथ चेतना के उचुंग शिखरों तक के जाती है और वहाँ से अहंकार-समर्प॑ण के द्वारा आनन्द-धाम तक पहुँचा देती €। वह परम प्रभु के सबश्रेष्ठ प्रकाश में निर्भयता, जीवन भौर आनन्द के दर्शन कराती है। इस प्रकाश को जिसने धारण कर लिया, . वह শি, खण्ड जीवनमय त॒था भानन्दमय वन गया । ` ...^उपासना क सियि वेद ते उन्मुक्त वातावरण, सरितार्भो के संगम अथवा गिरिर - के अधिष्ठान को সহ दिया है। वेदिक मक्ति शान, कर्म, त्तप, व्रतत, यक्त भादि का . तिरस्कार नहीं, सम्मान करती है। उसने व्यक्तिवाद एवं समाजवाद में भी समन्वय किया है। वह विचार, उच्चार तथा आचार की एकता का अतिपादन करती है। . . “बेदिक-भक्ति के :तीन अंग हैं : स्तुति, प्रार्थना और उपासना, जिनमें भागवत को नवधा भक्ति के सभी अंग अन्तभेक्त नहीं हो पाते। मेंने इन तीन अंगों की शुण-कीतेन, সাধনা, व्याकुलता, साधन और सिद्धि नाम के पाँच अंगों में विभक्त कर. दिया.है-। इस -विभाजन द्वारा वेद-वर्णित कुछ ऐसी भावालुभूतियाँ मौ पाठकों के জলন্ত आ नाती




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