भारतीय मज़दूर | Bharatiya Mazadoor

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतीय मजदूर 4९७... प्रथम पारच्छद 0 पूव कथन अरारहवी शताब्दी के अन्त तक सारतवप केवल अपनी जनसख्या के लिए ही तैयार माल उत्पन्न नहीं करता था वरन्‌ विदेशों को भी व्प्रपना तैयार साल सेजता था । उन्नीसदी शताब्दी के श्रारम्भ डोते ही भारतीय उद्योग-घन्धो का पतन आरम्भ हो गया । क्रमश भारतवप विद्शों विशेष कर ब्रिटेन से तैयार साल सेंगाने लगा और कच्चा माल तथा अनाज विदेशों को सेजने लगा । यह सब इस कारण छुश्रा कि भारत परतंत्र होगया । इस्ट इशणिडिया कंपनी की घातक नीति ने भारतीय घन्घो को नप्ट करने मे सहायता पहुँचाई । इघर ब्रिटेन से भाप तथा यंत्रों के श्ाविष्कार से औद्योगिक क्रान्ति हुई और वहा बढे-बडे कारखाने स्थापित हुए । अपने कारखानों के माल को भारत में खपाने के लिये यह आवश्यक था कि भारत के घन्घों को नप्ट कर के सारत को केवल कच्चा माल उत्पन्न करने वाला देश बना दिया जावे | इस नीति का फल याद हुआ कि भारत क्रमश चिदेशों को खाद्य पदार्थ तथा कच्चा साल सेजनें लगा ओर उसके बदले तैयार माल मगाने लगा 1 इसका परिंसाम यह कि उद्योग घन्घों में कास करने वाले भी खेती करने पर विघश हो गये ओर भारत की कज्ञा कारी गरी उद्योग-धन्ये नष्ट हो गये । श्रार्थिक पतन के साथ ही हमारा बोद्धिक विरारा रुक रया व्ौर हसारा वैतिक पतन भी झ्ारस्भ हो राया । १८२५० इसबी के उपरान्त गमनागसन के साधनों की उन्नति के फल स्वरूप नये उद्योग-घन्घों का भारत से प्रादुर्भाव हुमा । सब से पहले खेती से सम्बन्धित घंघो का यहां श्री गणेश 1 अंग्रेज व्यवसायियो ने




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