जीवन के पहलू | Jivan Ke Pahalu

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जीवन के पहलू - Jivan Ke Pahalu

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अमृत राय - Amrit Rai

Add Infomation AboutAmrit Rai

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
मरुस्थल खड्ड हैं थी उन्हें भी सपाट श्रौर समथल मानते हुए दी आारो बढ़ना हो सकता है । उनकी उस ओछी रददस्थी का भी एक रुचिकर व्यक्तित्व है । एक फूदड़ मकान है जिसके प्राणी उससे भी अधिक फूदड़ हैं । उस मकान का फर्श श्रस्यघिक फुसफुसी मिट्टी का है। मकान पर एक फूस का छप्पर है जो देखने की वीज ज्यादा है श्रौर काम की कम क्योकि उसमे जो कुछ तिनके थे भी उनका बड़ा अश लोगों की चिलम सुलगाने में खेत रहा । जो ही आया एक मूठा निकाल ले गया । एक कोने में एक खूब पेवने लगी हुई छुतरी टिकाकर रखी है | उसके पास ही मोटर के टायर का पड़ा है जिसे बच्चा उठा लाया है । कमरे भर मे कपडे टाँगने की तीन रस्तियाँ बेंधी हैं । कोई भी रस्सी पूरी नहीं दे श्रौर किनारा सुतली श्रौर बाघ के मेल से बनी है । एक श्रलगनी से एक ढोलक रटेंग रही है जो इस वक्त ढीली पडी है क्योकि छुः साल से उसे बजाने की नौवत नहीं आई । उसी ढोल्लक पर एक मजीरे का जोडा रखा हुआ है। वहीं श्रल्लगनी पर चोखे का पाजामा रखा है जिसका गा लाल चारख़ाने का है पीछा नीली धारियों का श्रौर दोनों टाँगे मटमेली सुफेद हैं। वद्दीं चोखे की एक मेली-कुचैली टोपी रखी है । एक कोने में एक भाड़ रखी है जिसकी बहुतेरी सींके भड चुकी हैं । एक जगह धरन से साइकिल का एक विगलित टूयूब लटक रहा है । कमरे के बीच छः साल के लड़के का खटोला है । उस खटोले पर इस वक्त खीरे बिखरे पड़े हैं जो सूख गये हू




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now