मानस का हंस | Manas Ka Hans

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
19.42 MB
कुल पष्ठ :
382
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)मानस का हंस १७चेहरा शांत किन्तु कुछ-कुछ पीड़ित भी था । वावा ने श्रपने कमण्डलु से जल
लेकर मैया के मुख पर छीटा दिया । उनके सिर पर हाथ फेरकर, उनके कान
के पास अपना मुख ले जाकर उन्होंने पुकारा--“रतन ! ” चेहरे पर हत्का-सा
कम्पन भ्राया पर झांखें न खुली । फिर पुकारा--“रतन 1”लगा कि मानो कमल खिलने के लिए भ्रपने भीतर से संघर्ष कर रहा हो ।
वावा ने राम-राम बुदबुदाते हुए उनकी दोनों आाखों पर श्रंगूठा फेरा । मैया की
श्राखें खुलने लगी । पुतलिया दृष्टि के लिए भटकी, फिर स्थिर हुई श्रौर फिर
क्रमश, चमकने लगी । मुरभाया मुख-कमल श्रपनी शक्ति-भर खिल उठा । होठों
पर मुस्कान की रेखा खिंच राई । शरीर उठना चाहता है किन्तु है ।
होठ कुछ कहने के लिए फडकने का निर्वेल प्रयत्न कर रहे हैं किन्तु वोल नहीं
फूट पाते । केवल चार श्राखे एक-दूसरे में टकटकी वाघे वडी सजीव हो उठी है ।
पति की श्रांखो मे श्रपार शांति गौर प्रेम तथा पत्नी की आाखों में झ्ानन्द श्रौर
पूर्ण कामत्व का श्रपार सत्तोप भरा है ।“'राम-राम कहो रतना ! सीताराम-सीताराम 1”होठों ने फिर फडकना झ्रारम्भ किया । कलेजे की प्राण कूलाचें कण्ठ तक शा
गईसीताराम 1! सीताराम ! ” बावा के साथ-साथ मैया के कण्ठ से भी क्षीण
श्रस्फुट ध्वनि निकली । वोलने के लिए जीव का सघर्प श्रौर वढा । वावा ने मैया
का हाथ अपने हाथ से उठाकर श्रौर प्रेम से दवाकर धीरे से कहा--“वोलो,
वोलो, सीताराम ।” “सी एक हिचकी श्राई, मैया की श्रांखें
खुली की खुली रह गईं श्रौर काया निश्चेष्ट हो गई । मृत देह पर जीवन की
एक छाप अब तक गेप थी । विरह से सुनी रतना मैया सुहागिन होकर परम
दवांति पा गई थी ।वावा थोड़ी देर वैसे ही मैया का हाथ अपने हाथ में लिए बैठे रहे, फिर
उठे और भीतरवाले द्वार की श्रोर जाने के बजाय सडक-पड़ते तीन द्वारों में से
वीच वाले का वेड़ना सरका कर उसे खोल दिया । बरनों वाद खुलने के कारण
जड़काष्ठ ने भी खुलने में वैसा ही संघर्ष किया जैसा मैया ने सीताराम थणब्द
उच्चारण करते हुए किया था । वावा बात भाव से चाहर चदूतरे पर श्राकर
खड़े हो गए 1र्मंया की मौत से कुछ पलों पहले वावा का श्रचानक श्राना गांववालों के
लिए एक चामत्कारिक अनुभव तो वना ही साथ ही बड़ गर्व का विपय भी बन
गया था । गोसाई महात्मा इस समय चांद-सुरज की तरह लोक उजागर थे ।
उनके गांव मे पैदा हए थे । जब हुमायूं और शेरणाह की लड़ाई के पुराने दिनों के
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