अष्टादश पाप - निषेध | Ashtadash Pap Nished
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
70
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अष्टादश-पाप निषेध | (६)
निगाह चील के मांनिद चौतरफा रहती है। उस का कोई
भी भरोसा नहीं करता । इसलिए तु चोरी का करना छोड़
दे ॥२॥ चोर चाहे कितना ही छिपता फिर एक न एक
दिन उसके पाप की पोल अवश्य खुलती है; ओर तव
पुलिस के द्वारा पकड़ा जाता ই | फिर वेतो रादि की मार
भी उसे खानी पड़ती है । इसलिए, तू चोरी का करना
छोड़दे ॥ ३ ॥ फिर नापने जाखने में भी तू चोरी करता
है; इसी प्रकार महस्तल को चुराने की चष्ठा तू किया करता
है। यो चोरी करना एक प्रकार का रिश्वत ही खाना है।
इसालिए तू चोरी का करना छोड़दे ॥४॥ ऐ भाई | अन्याय
और अधमे प्रेंक कमाये हुए धन से कभी आराम तो नश्षीब
होता नहीं ! फिर यों चोरी आदि के द्वाग धन कमाना,
दीन ओर दुनियां सभी की निगाहों से गिरना है। इसलिए
तू चोरी का करना छोड़दे ॥ ५ ॥ अगर त् किस के घर
नुक्शाद करता द्वे तो उत्त की आत्मा तुके सदा कोसती
रहेगी | जिससे तू खाक भें मिल जायगा । इसलिए तू
गेरी का करना छोड़दे ॥ ६ ॥ ए भाई ! पराये धन से सत्र
केर; अथात् तू उसकी इच्छा मत कर । जो हक की बात
हो या जो न्याय और धम से तुझे मिले उसी पर सन्तोप
कर | चोथमल तुझे ( बार बार ) कहता है, कि चोरी करना
शरदे ।॥ ७ ॥
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