व्याख्या प्रज्ञप्ति सूत्र (भगवती सूत्र द्वितीय खंड ) | Vyakhya Pragyapti Sutra (Bhagavati Sutra Khand- 2)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विशेषित १२ दण्डको की व्याख्या ८५६, लवणादि असख्यात द्वीप-समुद्रो का स्वरूप और प्रमाण ८६, लवणसम्‌द्र का स्वरूप ६०, अढाई द्वीप और दो समुद्रो से बाहर के समुद्र ६०, हीप-समुद्रो के जुभ নামী का निर्देश € ९१, ये द्वीप-समुद्र उद्धार, परिमाण और उत्पाद वाले ६१। नवम उदेशक--कमं (सूत्र १--१३) ६२-६८ ज्ञानावरणीयबन्ध के साथ अन्य कर्मबन्ध-प्र्षणा ६२, वाह्म पुदुगलो के ग्रहणपूर्वक महद्धिकादि देव की एक वर्णादि के पुदूगलो को अन्य वर्णादि मे विकुर्वण एवं परिणमन-सामर्थ्य ६२, विभिन्न वर्णादि के २५ ्रालापक सूत्र ६५, पाच वर्णो के १० द्विकसयोगी भ्रालापक सूत्र ६५. दो गध का एक श्रालापक ६४५, पाच रस के दस आलापक सूत्र ६५, आठ स्पण के चार आलापक सूत्र६५, अविशुद्ध-विशुद्ध लेद्या युक्त देवो दवारा अ्रविशुद्ध-विशुद्ध लेया वाले देवादि को जानने-देखने की प्ररूपणां ६५, तीन पदो के बारह विकल्प ९७1 दशम उदेशक-भ्रन्यतीर्थी (सूत्र १-१५) ६&-१०५ अन्यतीथिक-मतनिराकरणपूर्वक सम्पूर्ण लोक मे सवं जीवो के सुख-दुख को श्रणुमाच्र भी दिखाने की अ्रसम्थता की प्ररूपणा ९६९, दृष्टान्त दवारा स्वमत-स्थापना १००, जीव का निदिचत स्वरूप और उसके सम्बन्ध मे अनेकान्तशैली मे प्रश्नोत्तर १००, दो बार जीव शब्दप्रयोग का तात्पर्यं १०२, जीव कदाचित्‌ जीता है, कदाचित्‌ नही जीता, इसका तात्पयें १०२, एकान्त दु खवेदन रूप भ्रन्यतीथक मत निराकरणपूरवंक भ्रनेकान्तशली से सुख-दु खादि वेदन-प्ररूपणा १०२, समाधान का स्पष्टीकरण १०३, चौवीस दण्डको मे आत्म-शरीरक्षेत्रावगाढ पुदूगलाहार प्ररूपणा १०४, केवली भगवान्‌ का आत्मा द्वारा ज्ञान-दर्न सामथ्यं १०४, दसवे उदैशक की सग्रहणी गाथा १०५।सप्तम शतक १०६-२०४प्राथमिक १०६ सप्तम शतकगत दस उद्देशको का सक्षिप्त परिचयसप्तम शतक की सग्रहणी गाथा १०८ प्रथमउद्देकक--आहार (सूत्र २-२०) १०८-१२३जीवो के अनाहार श्मौर सर्वाल्पाहार के काल की प्ररूपणा १०८, परभवगमनकाल मे आहारक- अनाहारक रहस्य १०९. सर्वाल्पाहारता दो समय मे १०९. लोक के सस्थान का निरूपण ११०, लोक का सस्थान ११०, श्रमणोपाश्रय मे बैठकर सामायिक किये हृएु श्रमणोपासक को लगने वाली क्रिया १११, साम्परायिक क्रिया लगने का कारण १११ श्रमणोपासक के व्रत-प्रत्याख्यान मे अतिचार लगने की शका का समाधान १११. अ्रहिसाब्रत मे अतिचार नही लगता ११२, श्रमण या माहन को आहार दवारा प्रतिलाभित करने वाले श्रमणौपासक को लाभ ११२, चयति क्रिया के विशेष श्रथं ११३ दानचविशेष से बोधि श्रौर सिद्धि की प्राप्ति ११४, नि सगतादि कारणो से कर्मरहित (मुक्त) जीव की (ऊध्वे) गति-प्ररूपषणा ११४, अकमे जीव की गति के छह कारणण ११६, दु खी को द ख की आदि सिद्धान्तो की प्ररूपणा ११७, दुखी और झदु खी की मीमासा १ 4 রর তা[ १६ |७, उपयोगरहित गमनादि




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