यौवन और उसका विकास | Yauvan Aur Uska Vikas

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Yauvan Aur Uska Vikas by बाबू केशवकुमार ठाकुर - Babu Keshavkumar Thakur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यौवन के पूच॑ं सेजना के पश्चात्‌ वीर्यपात होने में वे आनंद का अनुभव करते हैं । इसलिए जब उनका व्यमिचार का काई साधन नहीं मिलता तो वे अपने हाथ के द्वारा अपनी इन्द्य से कामात्तेजना उत्पन्न करते हैं श्र मैथुन की ठीक अवस्था अनुभव करते हुए वीय॑ स्खलित करते हैं । इसमें उनके क्षण भरके लिए सुख तथा शान्ति मिलती है । इस प्रकार के युवक एकान्तप्रिय हुआ करते हैं । वे सबके समीप भोले- भाले और सरल के स्वभाव जान पढ़ते हैं । परन्तु वास्तव में वे सब से अधिक श्चरणहीन होते हैं । ये दे अवगुण जा ऊपर दिखाये गये हैं स्कूल के विद्यार्थियों में विशेषकर पाये जाते हैं । इस प्रकार के बालकें और युवकें की संख्या अस्सी और कहीं-कहीं नब्बे प्रति शत तक पायी जाती है । जिनसें ये अवगुण उत्पन्न हो जाते हैं वे अपने इन अवगुणां के साथ ही जीणंशीर्ण और कुशकाय हे। जाते हैं उनके शरीर का रक्त सूख जाता है मुख पीला और रक्तद्दीन हे जाता है । उनके मुख-मण्डल का बाल-सौन्द्य न है । जिन बालकें और युवकें में इस प्रकार के दुव्यंसन उत्पन्न हे। जाते हैं उनके शरीर और तेजह्ीन सुख के देखकर तुरन्त पहचाना जा सकता है । माँ-बाप अपने बालकें की ये अवस्थाएँ देखते हैं परन्तु वे समझा करते हैं कि स्कूल के पढ़नेवाले लड़के दुबले-पतले तो होते ही हैं । जब कभी इस प्रकार के बालकों और युवकें से बातें की जाती हैं और काई उनके इस अस्वास्थ्य का कारण पूछता है ता बिना किसी संकाच के वे लोग उत्तर दे देते पढ़ने में झधिक परिश्रम करना पड़ता है दे




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