Gandhivad Ki Shav Pariksha by यशपाल - Yashpal
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पुस्तक का साइज़ : 6.7 MB
कुल पृष्ठ : 172
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यशपाल - Yashpal

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सत्य और अदिसा का उहेश्य २१ सकता है। यदि मनुष्य अपने जीवन के लिये श्रादर्श उद्देश्य शऔर कर्तव्य की वात सोचना चाहता है तो उसका सबसे पहला कतब्य जीवित रहने के लिये प्रयत्न करना है । मनुष्य ने किया भी यही है | उसके व्यक्तिगत श्रौर सामूहिक कायों का इतिहास इस बात का गवाह है कि मनुष्य जीवित रहने भली प्रकार जीवित रददने श्रौर उत्तयोत्तर शक्ति और सामथ्य प्राप्तकर श्राराम श्रौर समृद्धि में जीवित रहने का यलल करता श्राया है। इस उद्देश्य को पूरा करने के हिये ही मनुष्य ने श्रादर्श उद्देश्य कर्तव्य श्र धर्म के साधनों का व्यवहार किया है । इस उद्देश्य के पूरा करने के लिये मनुष्य ने जो विचार और निश्चय किये जिन व्यवहारो का उपयोग किया उन सब की श.खला ही मनुष्य के धर्म श्रौर सम्यता का इतिहास है । मनुष्य जीवन को उद्देश्य श्रौर धर्म या कतंव्य को साधन मानकर भी कमी-कभी धर्म और कर्तव्य के लिये मनुष्य का जीवन बलिदान कर देना मुनाठिव होता है । बलिदान श्रौर कूवानी की उपयोगिता तथा बुद्धिमत्ता को समभकने के शिये यह ध्यान में रखना चाहिये कि मनुष्य एक व्यक्ति के रूप में झ्पना जीवन निवांद नहीं कर सकता । मनुष्य एक दूसरे के झ्रासरे जीते हैं। जिस प्रकार एक मनुष्य शरीर में करोडो कोष्ठ ८6॥59 या जीवाणु दोते हैं प्रत्येक श्रणु एक प्रथक जीव होता है परन्ठु मनुष्य शरीर से प्रथक होकर उन कोष्ठों श्रौर श्रणुओं का जीवन नहीं रह सकता । उसी प्रकार मनुष्य व्यक्ति भी मनुष्य समाज से प्रयक होकर अकेला जीवित नहीं रह सकता । व्यक्ति का जीवन समाज के जीवन से ही चल सकता है। व्यक्ति का दित-झ्रद्वित भलाई-बुराई समाज के हित-झ्रहित श्रोर भलाई-बुराई पर नि्र है । लाखों वरसों श्र पीढ़ियो के अनुभव से मनुष्य इस वात को समक गया है कि वह समाज से प्रथक जीवित नहीं रह सकता । मनुष्य की व्यक्तिगत उन्नति श्रौर शक्ति समाज की उन्नति पर ही निर्मर




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