ज्ञानावली | Gyanavali Part-1

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Gyanavali Part-1 by पूरण चन्द नाहर - Puran Chand Nahar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साधु बन्दना | ्् काढिक सूत्रनो बोह भाखी तिहां ॥ १॥ स्वामी शीतल जिन.साथ आनन्द ए सती सुढ्सा नमूं चित आनन्द ए.। एक सागर कोड तणो अंतरों क्यो एकसो सागर ऊणों कर संग्रद्यो ॥ २०५ सहस उावीस छयासठ ठाख ऊपरे काढिक सू नो छेद इण अंतंरे । श्री श्रयांस शुनि गोध बधाइये धारणी साहुणी ब्रठे चरण चित लाइये ।। ३ ॥ पूर्व भव गुरु कहूँ साथ संभूत ए. विस नस्दी बे सुगुण संयुत्त ए। अचल मुनिधुर नमूं पठम हृठघरा ए बंधन उप पष्ठ केखव सिरघरा ए ॥ ४। चौपन सागर बिच थया केवठी बन्दिये सूती वोह भख्यो वली । इम बिछेद बिच सात जिण अन्तर जाणिये शान्तिजिन बर लखे इण परे ॥ ॥ स्ामी वासपुज्य जिन साध सी धमंघर साहुणी वे जिहां घरणि उपद्रव हर । सुगुरु सुभद्ठ सु बंघव व्साणिये विज मुनि बंधव द्विएप्ट हरि जाणिये | ६ ॥ तीस सागर बिच अन्तरे ज थृया केवली चंदिये याव संगत सया । विमछ जिन बन्दिय साथ सिमन्थर बी समभी धघरणी धरा आगम सांभली ॥ 9 गुरु सुदरशन मुनि सागर दत्त ए ़व हरि बंधन भद्र दिव पंत ए। नव सागर बिन अंतर केंबली जे थया ते सहू वंदिसे वा वढ़ि ॥द1। है अ श




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