अतीत के चलचित्र | Atiit Ke Chalachitra

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Atiit Ke Chalachitra by महदेवी वर्मा - Mahadevi Varma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चल-चित्र | १३ में उनका नियम जैसा निश्चित और अपवादहीन था, भोजन बनाने के सम्बन्ध में उससे कम नही । एक ओर यदि उन्हे विश्वास था कि उपासना उनकी आत्मा के लिए अनिवायं है, तो दूसरी ओर दृढ़ धारणा थी कि उनका स्वयं मोजन बनाना हम सबके शरीर के लिए एकान्त आवश्यक है । हम सब एक-दूसरे से दो-दो वर्ष छोट-बड़े थे, अतः हमारे अबोध और समझदार होने के समय में विशेष अन्तर नही रहा । निरन्तर यज्ञ-ध्वंस मे लगे दानवों के समान हम मां के सभी महान्‌ अनुष्ठानों में बाधा डालने की ताक में मंडराते रहते थे, इसी से रामा को, हम .विद्रोहियों को वश में रखने का गुरु-कतंव्य सौप कर कुछ /निश्चिन्त हो सकीं । रामा सवेरे ही पूजा-घर साफ कर वहाँ के /बतंनों को नीबू से चमका देता- तब वह हमें उठाने जाता । उस बड़े पलेंग पर सवेरे तक हमारे सिर-पर की दिशा आर स्थितियों में न जाने कितने उलट-फेर हो चुकते थे । किसी की गर्दन को किसी का पाँव नापता रहता था, किसी के हाथ पर किसी का सर्वांग तुलता होता था और किसी की साँस रोकने के लिए किसी की पीठ की दीवार बनी मिलती थी । सब परिस्थितियों का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करने के लिए रामा का कठोर हाथ कोमलता के छमञ्मवेश में, रजाई या चादर पर एक छोर से दूसरे छोर तक घूम आता था और तब वह किसी को गोद के रथ, किसी को कंधे के धोड़े पर तथा किसी को पैदल ही, मृख-प्रक्षालन-जसे समारोह के लिए ले जाता । हमारा मंह-हाथ धृलाना कोई सहज अनुष्ठानं नहीं था, क्योकि रामा को दूध बताशा राजा खाय कां महामन्त्र तो क्गातार जपना ही पडता था, साथ ही हम एक-दूसरे का राजा बनना मी स्वीकार नहीं करना चाहते थे । रामा जब मुझे राजा कहता, तब नन्‍हें बाबू चिड़िया की चोंच जैसा मुंह खोल कर बोल उठता--लामा इन्हें कौं लाजा कहते हो ?' र कहने में मी असमर्थ उस' छोटे पुरुष का दम्म कदाचित्‌ मुझे बहुत अस्थिर कर देता था। रामा के एक हाथ की चक्रव्यूह जसी उंगलियो में मेख सिर अटका रहता भा ओर उसके दूसरे हाथ की तीन गहरी रेखाओं वारी हथेली सुदशंनचक्र के समान मेरे मुख पर




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