अभिमन्यु नाटक | Abhimanyu Natak

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Abhimanyu Natak by गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास - Gangavishnu Shreekrishndas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ [ अभिमन्युनाटक- मेँ वशुपति ह. पावैतीने कहा-भपके सगतो ই ही नहीं, शिव-भरी ! भे स्थाण हू. पावेती-वृक्ष तो बोलते नहीं शिव-में शिवाका जीवन प्राण हूँ, पा०-तो वनमें जाकर शब्द करो, इस प्रकार पार्वतीवचनसे निरुत्तर हुए शिव तुम्हारी रक्षा करें ॥ १ ॥ स्त॒ति श्रीकृष्णकी । जय जय जय जय सुकुन्द्‌, नन्‍्दके दुलारे। शीश मुकुट तिलकभाल, काननकुण्डल विशाल, कृण्ठ माहि गुश्नमाल, मुरली कर धारे ॥ १॥ ग्वाल्बाल लिये संग, रचत सदा रासरंग, बजत बाँसुरी मुस्चंग, यमुनके किनारे ॥ २॥ काहूकी फोरत घट, काहूकी पकरत लट, काहूका घूँघट झट, खोलत ठिग आ रे॥ २॥ घन धन धन श्रीमुकुन्द, काटहु दुख हरहु इन्द्र श्रीगोविन्द, श्रीगोविन्द, श्रीगोविन्द ~, ॥ 9 ॥ कृपासिन्धु विश्वनाथः मागत वर जोर हाथ, मसह सदा रमा साथ; इद्यमें हमारे ॥५॥ सूत्रधार-( सब जोरको देखकर ) बारम्बार धन्य है उस जगदा- धारा सूजनहार करतारको, जिसने संसारमें अनेक प्रका- रके पुष्पोद्यान निर्माण किये हैं; जिसमें भोति माँतिके फूल फूल रहे हैं, उन अनोखे अनोखे पुष्पोंकी सुगन्ध सनी. त्रिविध बयारके सश्चारसे सब संसार सुगन्धित हो रहा है, ( जागे बटकर ) अह, हाहा ! भज तो यह दरवार भीमाब्र




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