पृथ्वीराजरासो (भाग 3) | Prithviraajraso (Bhag 3)

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Prithviraajraso (Bhag 3) by मोहनलाल विष्णुलाल पंडिअ - Mohanlal Vishnulal Pandiaश्याम सुन्दर दास - Syam Sundar Das

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मोहनलाल विष्णुलाल पंडिअ - Mohanlal Vishnulal Pandia

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श्यामसुंदर दास - Shyam Sundar Das

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नामा मयमाना कर काम क. টু रखयम में राजा भान राज्य करता था उसकी हसाबती नामक एक सुन्दर कन्या थी और चन्देरी में शिशुपाल वशी पचाइन[नाम राणा राज्य करता था। ३ हसावती की शोभा का बेन । ४ चन्देरी के राजा का हसावती पर मोहित होकर रणथभ के दूत मेजना | ३ चम्देरी के दूत का रशथम में जांकर पत्र देना | ४ रखथम के राणा भानुराय का कुद्ध होकर उत्तर देना भि भ चन्देरीपाति से युद्ध ककंगा, उसके घुड़कने से नहीं डरता। ६ चन्देरी पति का कुपाते होकर रण- थम पर चढ़ाई करना | ७ चन्देरीपति का एकं दूत राजा मान को सममाने को भेजना और एक शद्दाबुद्दीन के पास मदद के लिये। ८ ज््री क पीछे रावण दुर्योधन इत्यादे का मान प्राण और राज्य गया । < जीव रखा के लिये देव दानवादि सब उपाय करते हैं । १० भानुरय भर्व का बसीठ की बात न मानना | ११ बसीठ का लौट कर चन्देरीपति की फौज में जा पहुचना। ११ पचाइन की सहायता के लिये गणनी से नूरी खा हुआब खा आदे सदौर का आना । १३ दोनों धन घोर सेनाओं सहित शनन्‍्देरी के राणा का आगे बढ़ना | १४ चन्देरौरान की चदाह का वशेन] १५ रशर्थम पाति मन का पृथ्वीराजे से सहायता भागना | ( ११ ) १०५५. 9 १०५९ गी | १०५६८ | ই आनराय को प्ृथ्वीगण का पत्र लिखना । १७ उक्त पत्र पढ़ कर प्ृथ्वीराम का মমি जी के पास कनह को ঈশলা। १८ कन्द्र का समर सिंह के पास पहुच कर समाचार कहना । १९६ समर सिंह जी का तेना तय्यार करके कन्द्द से कहना कि हम अमुक स्थान पर आ मिलेंगे | २० সি হযাখদ হনব ६५ इस लिये तुमसे आगे पहुचेगे। ५ ५ २१ कन्ह का कहना कि पृथ्वीराज दिल्ली से १३ को चले हैं और राजा भान प्र बड़ी विपात्तै है| २२ समरसिह का कहना कि हमारे कुल की यह राति नही है कि शरणागत को त्यागें और बात कहके पलटें | रद समर सिंद का कन्ह की दी हुई नभर को रखना | २७ कन्ह का यह कह कर कूच करना करि तेरस को युद्ध होगा । २५ दसमी सोमवार को समरसिंह भी की यात्रा का सुहत वशेन | र यात्रा के समय समरसिह जी की चतुरगिनी सेना की शोभा बर्यान । २७ सुसजित सेनाओं सहित रखथभ गढ़ के बाए ओर पृथ्वीराज श्रौर दाहिने ओर से समर्रस्तिह जी का आना । शष् पृषे में पृथ्वाराज और पश्चिम में समर सिंह जी का पड़ाव था ग्रार बच में रथम का किला भर श्रत्ु की फैज थी । २५ किले और आस पास की रखणभूमे की पत्ती से उपमा वंन । १०१० १०९५, १०४५९ भ [1 | १०६१ १०६२ १०९१




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