मानवता के दूत भाग - 1 | Manavata Ke Doot Bhag - 1

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Manavata Ke Doot Bhag - 1  by जय प्रकाश - Jay Prakash

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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त्तरह हुई, वह इतिह्याप्त में एक अत्यन्त दर्दनाक पव-है.3.मो हि पुत्र की मृत्यु के ठोक पद्धह दिन बाद बंपर रो रात भे-कुछ,धर्म द्ोही लोगों ने महामौद्गल्यायन की “सुनों“कुटी की ;घेरईर लाठियों के प्रहार से उनके मस्तक को च्‌र-चूरे करके शत एक झाड़ी में फेंक दिया था । भगवान बुद्ध के मत्र में महामौद- गल्यायन के प्रति कितना सम्मान था यह तो इसी से पता चलता है कि उन्होंने महामीद्गल्थायन के सम्मान में उनकी धातुओं (अस्थियों)पर राजगृह में एक चेत्य वतवाया था । महामीदुगल्यायन परम निर्वाण प्राप्त, रागरहित और विमल चित्त वाले भिक्ष थे। एक बार मोद्यल्यायन वैशाली में भिक्षाटन करते घूम रहे थे । एक गली में बिमला नामक रूपसी युवती रहती थी | मौद्गल्यायन की परम शान्त-सोम्य आकृति पर वह सुग्ध हो यई । उसे अपनी जवानी और रूप पर बड़ा अभि- मान था। किसी को भी फंसा लेना उसका बाँए हाथ का खेल था। महामौद्गल्यायन जब 'चारिका' से अपनी कुटिया में लौटे तो वहाँ पुरी तरह सजी-धजी विमला उपस्थित थी । उसमे अपनी मीठी-मीठी बातों तथा अनेक मनमोहक हाव-भावषों के द्वारा मोदगल्यायन को जाल में फंसाना चाहां। महामौदगल्यायन ने घिमला को इस कुत्सित व्यवहार के लिए इतना धिक्कारा कि उसका रूप और यौवन का सारा घमण्ड चूर-चूर हो गया। वह्‌ ग्लानि और लज्जा के मारे पानी-पानी हो गई । उसमे वहीं पर सन्‍्यास लेने का निश्चय किया, पर उस समय उस पर विश्वास कौन करता | संघ से अलग रहकर वह अकेले ही धर्म-साधता में लग गईं। बाद में उसे संघ में शामिल कर लिया गया। सारिपुत्र ओर महामोद्यल्यायन” अपने इन दो शिष्य-रत्नों




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