व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र | Vyakhya Pragyapti Sutr

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Vyakhya Pragyapti Sutr by मिश्रीमल जी महाराज - Mishrimal Ji Maharaj
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
23 MB
कुल पृष्ठ :
1002
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है। पुंदगैल में वर्ण, गधे, रैस और स्पर्श होते हैं। वण का हमारे शरीर, हमारे मन, शावेगर और कक्‍पायो से पझ्रत्यधिक सम्बंध है । शारीरिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य, मन का स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, भावेगा की वृद्धि ओर कमी -ये सभी इन रहस्यो पर झाधुृत हैं कि हमारा किनि-विन रो के प्रति रकान है तथा हम क्नि-विनन रुगो से भाव॑पित घौर विकपषित होते हैं । तीले। रण जब शरीर मे कम होता है तब फोध की माना बढ जाती है। नीले रंग वी पूर्ति होते पर क्रोध स्वत ही कम हो जाता है। श्वेत रग की वमी होने पर स्वास्थ्य लडखडाने लगता हैं। लाल रग वी न्यूनता से भालस्य और जडता बढने समती है। पीले रण की कभी से ज्ञानततु निष्क्रिय हो जाते हैं प्रार जब ज्ञानततु निष्क्रिय हो जातें हैं, तव समस्यात्ना का समाधान नहीं ही पाता । काले रग की कमी होने पर प्रतिरोध वी शक्ति कम हो जाती है। रगो वे” साथ मानव के शरीर का क्तिना गहन सम्बंध है, यहे इससे स्पप्ट है । 'नमों अरिहृतांण' वा ध्यान श्वेते वर्णे के साथ किया जाय | श्वेत व॑ण हमारी धो तरिक शक्तियो को जागत करने में सक्षम है। यह संमूचे ज्ञान को सवाहक हैं । शदेत॑ वर्ण स्वास्थ्य का प्रतीक है। हमारे शरीर में रक्त की जो कोशिकाएँ हैं, वे मुख्य रूप से दो रग वो हैं--श्वेत रंक्तकणिकाएँ ( ५ 8 (? ) भ्रौर लाल रक्त- कणिकाएँ (7 8 0 )। जब भी हमारे शरीर मै इन रक्तकणिकाओो का संपुलन विगडता है तो शरीर रुग्ण हौ जाता है। नमो प्रिहताण' का जाप करने से शरीर मे श्वेत रण की पूर्ति होती हैं। नमो सिद्धोणा!ँ का वार्ल सूर्य जैसा लाल वण हैं। हमारी झातरिक दृष्टि को लाल वर्ण जांग्रत करता है । पीटयूटरी स्लेण्ड्सू के भरत स्राव को लाल रग नियीनत॑ करता है। इस रंग से शरीर में संक्रिता प्राती है। 'नमो सिद्धांणं मत्र, साले वर्ण औरदर्शन के द्व पर ध्यान वे(द्रित करने मं स्फूति का संचार होता है | 'नमो भ्रायरियाणं- इसका रग॑ पीली है। यहै रग हमारे मन को सक्रिय बनाता है। शरीरशास्तिया का मानना है कि थायराइड ग्लेण्ड भ्रावेगा पर नियच्तर्ण करता है। इसे ग्रन्थि का स्थान कठ है। भाचाय के पीले रग के साथ विंशुद्धि केन्द्र पंर नमो प्रायरियाण! को ध्यान करेंने से पविश्रता वी सबद्धि होती है| 'नैमों उवज्फायांण” का रग नीला है। शरीर में नीले रण की पूर्तिइस पद व॑ जप से होंती है। यह रंग शॉतिदांयक है एकाग्रता पैदा करता है भौर कपाया को शॉत करता है ।“नमी उवज्कायाण के जप से झान॑द-वेद्ध सक्रिय होता है। 'नमो लाए सब्वसोहृण का रग काला है। कालाबण ग्रवशोपक है। शक्तिके-द्र पर इस पद का जप करने से शरीर मे प्रतिरोध शक्ति बढती है। इस प्रकार वर्णों केसाथ नमोबकार महामंत्र का जंप करन का सवेते मच्त्रशास्त्र के चाता श्रार्चायों में फियो हैं। मय भप्रनेंक दुष्टियोंसे नमस्कार महामत्र क सम्ब ध मे चितन किया गया है। विस्तार भय से उस सम्बंध में हम उन सभी वो चचानहीं कर रहे हैं। जियासु तत्सम्वघी साहित्य का अवलोकन करें तो उहेँ चितन की प्रभिवव सामप्री प्राप्त होगीझर वे नमस्कोर महामज के प्रदुभुत प्रभाव से प्रभावित होगे।नमस्कार महाम भर को आचाय श्रभयदेव नें भगवती सूर्च का अग भांन॑वरे व्यॉन्यो की हैं। प्रावश्यश० नियु क्ति में नियू क्तिकार ने स्पप्ट शब्दा मे लिखा है--पचपरमैष्ठियो को नमस्कार कर सामायिक परनी चाहिंए। यह पच-नमस्कार सामायिक का एक अंग है ।* इससे यह स्पर्ष्ट है कि नमस्‍्कौर महामत्र उतना ही पुरानों है जितना सामायिक सूभ । सामायिक झ्ावश्यक्सूत्र का प्रथम अध्ययन है। भाचाय दंववाचक ने भाभमो की सूची में भ्रावश्यकसूंत्र वा उल्लेख क्या हें। सामायिक के प्रारम्भ मे भौर उसके भन्‍्त म नमस्कार मात्र वा पाठ क्या जाता था। कायात्सग के प्रारम्भ भौर भरत में भी पचन॑मस्‍्कार का विधान हैं। नियु क्ति वे प्रभिमतानुसार नदी१ क्यपचनमोवकारों वरेइ सामाइयति सोषमभिहितो। सामाइयगमेव थ ज सो सेस भतो बोच्छ॥ +-भावश्यकनियु क्ति, माया १०२३७[२५1




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