हिन्दी विद्यापीठ ग्रन्थ-वीथिका | Hindi Vidyapith Granth-Vithika
श्रेणी : साहित्य / Literature

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutAgarchand Nahta
Add Infomation About. Dr. Satyendra
Add Infomation AboutNoor Muhammad
Add Infomation AboutMuni Kantisagar
Add Infomation AboutLalluji Lal
Add Infomation AboutShreevasudevsharan Agrawal
लेखक :
अगरचन्द नाहटा - Agarchand Nahta,
डॉ. सत्येन्द्र - Dr. Satyendra,
नूर मुहम्मद - Noor Muhammad,
मुनि कन्तिसागर - Muni Kantisagar,
रूपरसिक - Ruprasik,
लल्लूजी लाल - Lalluji Lal,
श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल - Shreevasudevsharan Agrawal
डॉ. सत्येन्द्र - Dr. Satyendra,
नूर मुहम्मद - Noor Muhammad,
मुनि कन्तिसागर - Muni Kantisagar,
रूपरसिक - Ruprasik,
लल्लूजी लाल - Lalluji Lal,
श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल - Shreevasudevsharan Agrawal
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
445
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
अगरचन्द नाहटा - Agarchand Nahta
No Information available about अगरचन्द नाहटा - Agarchand Nahta
डॉ. सत्येन्द्र - Dr. Satyendra
No Information available about डॉ. सत्येन्द्र - Dr. Satyendra
नूर मुहम्मद - Noor Muhammad
No Information available about नूर मुहम्मद - Noor Muhammad
मुनि कन्तिसागर - Muni Kantisagar
No Information available about मुनि कन्तिसागर - Muni Kantisagar
लल्लूजी लाल - Lalluji Lal
No Information available about लल्लूजी लाल - Lalluji Lal
श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल - Shreevasudevsharan Agrawal
No Information available about श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल - Shreevasudevsharan Agrawal
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)खण्ड १ ]जाहरपीर १९बोलो बांगर के बीर की मदद ।बाछुलि को पूत बांजन कूं भूत, परचे की खातरि घाया ई ऐ
श्रजी हिन्दू मुसलमान दोनों दीन धार्मे, बादशाह नहीं आया ई ऐ ।
गूसा भया बागर कोई राना, जब घोड़ा सजवाया ई ऐ
घोड़ा मारि गयौ डिल्ली कूं बास्थाइ जाइ जगाया ई ऐअजी लाल पलंक पे सोवे बास्याइ पलके ते श्रौंधा मारा ईऐ
अजी दौरी आई बास्याई तेरी अम्मा कौनें मरद सताया ई ऐ
पांच मौर और एक नारियल पीरजी कौ पंजौ उठाया ई ऐ
जब मेरो मालिक महरि करे, सब् कूनबा जारति आया ई ऐ
महलव में राजा देवराय निरपु दुरूयाइभली सी रानी किसिमिति में ई फलू नांइजोगी जती सेऐ मैने इन पै मेने डारुयो सुवालरानी और संकलपी गाय, रानी किसिमित में तो फल नाँइ
अरे भली सी रानी ०रानी माल परगनों बहुत ऐ बैठी भूंजी राजूराजा माइ बिना कैसौ माइकौ, पिय बिन कैसौ सिंगारघन बिन् नांइ धनेसुरी राजा ऋतु बिन नाइ मल्हारमहलन में रानी ज्यों रही ए समझाय ।श्ररे संग सहेली बोलि के करि श्रार्मो गाइ बजाइपिया पनारे पौरि जूं धनि ठाड़ी पकरि किबार ऐश्ररे बांह छड़ाएऐं जांतु ऐे निबल जानि के मोय एऐपरि हिरदे में ते जाइगौ राजा मरद बदूंगी तोय ऐजो तेरी मनसा जोग पै काए कं कीयौ ब्याहु ऐपरि नौ से घोड़ी ले चढ़ यो बाबुल जी की पौरि एऐबनजारे की आगि ज्यों गयी सिलगती छोड़िअरे मेरे राजा जौ तेरी मनसा जोग पै तपी हमारे द्वार ऐ
मढ़ी छवाइ दर काच की मढ़वाइ दर हीरा लाल एंपरि गंगा मंगाऊं हरह्वार की नित उठि करो अ्रसनान ऐ
भूखे तो भोजन करूं हारे दाबू पांइ ऐज्यों जोगू बने रानी ज्यों बनिबे कौ नांइ ऐ.परि ऐसे जोग नां बनें रहे भोग का भोग ऐश्रे राजा साधू जन थमते भले जौ मति के पूरे होंइअरे राजा बंदा पानी निर्मला जो जल गहरा होइसाधू जन थमते भले मति के पूरे होंइश्री रानी बंदा पानी गांदला बहता निरमल होइसाधू जन रमते भले जाते दाग न लागे कोइ
श्ररे राजा गलखासा जामा बोरि की किया भगम्मर भेस ऐ
User Reviews
No Reviews | Add Yours...