दृष्टान्त सरित सागर | Drishtant Sarit - Sagar

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Drishtant Sarit - Sagar by डॉ. रामचरण महेन्द्र - Dr. Ramcharan Mahendra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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एक लाख रुपये के मूल्य का कोमती स्लोक तक ससुराल रहकर ही जायगी । अब आप आज्ञी दीजिये यहीं लज्जा सहूंगा । पिता--भारवि तू मेरा इकलौता पुत्न है । बड़ी मुसीबतों से तुझे पाल पोसकर गाज इस योग्य बनाया है। तेरी माँ तो तेरे बिना एक पल भी जीवित नही रह सकतीं । तेर वियोग से हमें कितना क्षोभ होगा इसका ततिंक अनुमान तो कर बेटा छो दर भारवि--नही पिता जी । मैं ससुराल चला । प्रायस्चित्त करना ही है मुझे तभी मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी । ( जाता है ) । पित्ता-लो लड़का जल्दबाजी में भाग गया । यीह नह जानता क्रि जल्दबाजो गलतियों की जननी है। यह दुष्प्रवृत्ति शक्ति और आत्म विश्वास को भड्ञ कर देती है। हाय । अब कया करू दूसरो झाँको शारवि ससुराल में (ससुराल में रहना लज्जा का जीवन है। पहले कुछ दिन तक तो ससुराल मे भारवि का बडा स्वागत सरकार हुआ । स्वादिष्ट भोजन मित्रो के समागम का सुख उनको दिया गया भोजन के अवसर पर स्त्रियां मजलगान करती । सभी उन्हे प्यार दिखाते । पर जब ससुराल यालो ने यह सुना कि भारवि बारह वर्षों तक यही रहते आये है तब उनका उत्साह रुण्डा पड़ गया। )..... भारवि--खित जोतते हुये) पिताजी ने ठीक ही सजा दी है । ससुराल में रहकर मुझे जो लज्जा और तिरस्कार मिल रहा है वही प्रायश्चित्तका रूप है । इस अग्नि में तपकर ही मेरीआत्मा




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