हिंदी दास बोध रामदास | Hindi Das Bodh

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Hindi Das Bodh by रामदासजी - Ramdasji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ ) भी एक और बातकी जरूरत होती है। और वद दै भक्ति । भारतीय विदारशीलोंने बहुत कुछ सोच विचार कर अन्तमें यही निश्चित किया था कि मनुष्यको सत्यके माग॑ पर लगाये रखनेके ढिए, सदा आस्तिक श्रौर सच्चरित्र रखनेके ढिए यदि सबसे अधिक किसी चीजसे सहायता मिल सकती है तो वह .मक्तिसे ही मिल सकती है । भक्ति दी मनुष्यमें सबसे अधिक गुणोंकी स्थापना कर सकती है और 'संसारको अनेक प्रकारके श्रनयोँसे बचा सकती है । भी समयंकी सूद दृष्टसि भढा इतनी बड़ी बात कैसे छूट सकती थी ! इस लिए उन्होंने घर्म-मागमें भक्तिको बहुत बड़ा स्थान दिया है । उन्होंने जन-साधारणके छिए तो भक्तिकी व्यवस्था. दी ही है, पर साथ ही ऐसे लोगोंके लिए भी भक्तिकी आवश्यकता बतलाई है जो संसारसे सब प्रकारसे विरक्त होकर उनके उच्च आदर्श तक पहुँच गये हों । उनकी आज्ञा है कि जो लोग परमात्मा तक पहुँच गये हों, उन्हें भी भक्ति-मार्गका कभी त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि सदा उस पर श्रारूढ़ रहना चाहिए । मनुष्य सात्रकों सन्मांगंमें छगाये रखनेवाले इस दूसरे साघनका भी श्री समर्थने जो विवेचन और प्रतिपादन किया है, वदद भी उनकी छोक-कल्याणकारिणी बुद्धिका एक श्रच्छा नसूना है । संसारके सभी लोग विरक्त, त्यागी और वीतराग नहीं दो सकते, अधिकांश लोगोंको संसारमें रहकर घर ग्रदस्थीके कामोंमें ही जीवन बिताना पड़ेगा । ऐसे लोगोंके लिए श्री समथका यह: आदेश है कि वे ग्रहस्थाश्रममें रहकर ही परमाथंका अधिकसे अधिक साधन करे । उन्दोंने इस ग्हस्थाभ्रमका बहुत अधिक महत्व बतलाया.है और इदलोक तथा परढोकके साघनका मुख्य आधार कहा है । इससे सिद्ध है कि श्री समर्थ कभी यह नददीं चादते थे कि सभी लोग घर-बार छोड़कर सिर मुड़ा लें ; क्योंकि न तो सब लोग साधुओका-सा आचरण ही कर सकते हैं श्ौर न सब छोगोंके त्यागी दोनेसे संसारका काम ही चढ सकता है । जो बने हुए साधु और मद्दात्मा लोगोंको चारो ओर ठगते फिरते हैं, उनसे भी श्री समर्थने सबको बहुत सचेत कर दिया है । उन्दोंने ऐसे पाख- ण्डियोंके बहुतसे ढक्षण बतढाये हैं और सबको ऐसे पाखशड' तथा पाखण्डियोंसे बचनेका उपदेश दिया है । एक सच्चा साधु और महात्मा इसके छिवा और कर ही क्या सकता है ! एक सच्चे हिन्दूके समान श्री समर्थने वर्णाश्रम घर्म पर अपनी पूरी श्रास्था प्रकट की. है । यदि सच पूछिये तो इस सम्बन्धमें उन्होंने अपने जीवनमें बहुत कुछ कार्य भी किया है। पर फिर भी वे इस वर्णाश्रम संस्थाके वैसे अन्घभक्त नहीं हुए, जैसे' अन्धमक्त भाज कलके बहुतसे सनातनी कइलानेवाले छोग होते हैं। उन्होंने ्राह्मणोंको सबसे अधिक. पूज्य अवश्य कहा है; पर साथ ही साथ यह भी कहा है कि भगवान जात-पाँत कुछ सी नहीं देखते । वे केवल भावके भूखे हैं। और ये दोनों बातें एक ही साथ एक सँसमें कही गई हैं । इस. प्रकार आपने मनुष्य सान्नके साम्यकी भी स्थापना की है, । वस्तुतः,जो. मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनेसे छोटा, नीच; ुच्छ या हीन समसाता हो, वह स्वयं कभी मनुष्य हो ही नहीं सकता । गौरव झ्पने आपको दूसरेसे बड़ा समसनेमें नहीं है, बल्कि अपने आपको सबसे छोटा समझने और भूले हुए लोगॉंका बाय पकड़कर और उन्दे गे




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