राजनीति - शास्त्र | Rajniti Shastra

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Rajniti Shastra by एडी आशीर्वादम् - Adi Ashirvadamगंगा रत्न पाण्डेय - Ganga Ratna Pandey
लेखक : ,
पुस्तक का साइज़ : 27.5 MB
कुल पृष्ठ : 560
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है | श्रेणी सुझाएँ


यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

एडी आशीर्वादम् - Adi Ashirvadam

एडी आशीर्वादम् - Adi Ashirvadam के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

गंगा रत्न पाण्डेय - Ganga Ratna Pandey

गंगा रत्न पाण्डेय - Ganga Ratna Pandey के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश (देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
राजनीति-शास्त्र का स्वरूप व्याप्ति श्रौर पद्धतियों € मानवके समस्त सामाजिक सम्वन्धोकी विवेचना करता हैं जव कि राजनीति-गास्त्र केवल राजनैतिक सम्वन्चोकी विदेचना करता है। राज्यकी प्रारम्भिक श्रवस्याग्रोके सम्बन्धमें यह भले ही सत्य न हो पर वर्तमान राज्यके सम्बन्धमें यह नितान्त सत्य है। झ्रपनी प्रारम्भिक श्रवस्थामें राज्य एक राजनैतिक सस्थाकी श्रपेक्षा एक सामाजिक सस्थाके रुपमें श्रधिक था। गिलुक्राइस्ट के शब्दोमें . समाज-शास्त्र समाजका विज्ञान है राजनीति-शास्त्र राज्यका भ्रथवा राजनेतिक समाजका विज्ञान हैं। समाज-शास्तमें मनुप्यका एक सामाजिक प्राणीके रूपमें ग्रथ्ययन होता है शरीर चूकि राजनेतिक-मगठन एक घिणेए प्रकारका सामाजिक सगठन है इसलिए राजनीति-शास्त समाज-घास्त्रकी श्रपेला एक श्रधिक विदिष्ट शास्त्र हैं घ्यवा जैसे श्री कोनेनवर्ग ने कहा हैं जवक्ति समाज-धास्नमें समाजके विभिन्न वर्गों श्रौर सघोके सघठन श्र कार्यकलापोका का होता है राजनीति-णास्तका विवेच्य विपय एक विणिष्ट-सघ श्र्थात्‌ राज्य ता है। (स) समाज-घास्त्र (50010108४) केवल सगठित्त समृदायोकी ही विवेचना नही करता वह ग्रसगठित समुदायोका भी श्रध्ययन करता है। पर राजनीति-दास्त्रका सम्बन्ध केवल संगठित समाजने ही रहता हैं। चह केवल ऐसे समुदायोका ही सव्ययन करता हैं जिन पर राजनैतिक समठनका प्रभाव पड चुका होता है। इस प्रकार समाज- चान्मकी श्रपेक्षा राजनी ति-लारब्रका जन्म यादमें हुसा है। (ग) समाजन्यास्त्र नागरिकोंने वैदालिक तथा विधियासी (1.61) या शनित- साध्य ((०८०ा४८) सम्चन्धोके साप-याथ परम्परात्रों श्राचारों (( 05६10115 णितााटा5) तथा धर्म श्ौर पार्धिक जीवनने विकासका भी श्रध्ययन करता है। राजनी ति-यारव्रमें केवल प्रपम विपय--वैधानिक तथा उस्तिन्ताध्य सम्बन्चों (1.01 01 000४८ दटाप(1005115) --की ही चिचेचना हाती है। (घ) राजनीति-शान्तमे मनुप्यके जान बूभ् कर नायास (( 001521005) किए हुए फाणपा ही प्रध्ययन किया जाता हैं समाज-घस्तने इसके साय-पाय श्रनजानमें घनायान दिए गए कार्योश भी विवेचन होता हैं। . (प) रायनीनिन्यानयरय पा गनन्विन्दू (5818४ 01) या प्रारमन ही इस घारणाके साथ दै थि मनुष्य एण पर्जनतिए प्राणी है। समाज-यास्त इस घारपासे पाक स्थिति नफ दृष्टि टालता है थीए उस बातकी विठेच्ना लरना है फि सनुप्य से श्रं।त पयो रायरमंतिए प्राणी दन गया | रो .. (हर) समायन्यानप वेदल एस जानता पप्ययन रस्‍ता है कि समाजमें कया हो चुरा हूँ घोर पया रो रा ऐ स्या होना चाहिए उपाय सपयप व सही बरता । राजनीविनयस्परा पार गे एस पएडू रस प्रर्नय शियेसस एएसा है लियया लिया जाना चाहिए? करन धपसन ही न पयर स्लानमणण कान मूल अटक काना मी लग न्याय ना नानक ही 37 पयपरानद हमसे ये मत वन उसरए घनतबग ने दिया ह । उनणा रसा पा पाए 2 सिप पी समाजूास्थ नर नस सि स्पान पर थे आप हक यह सका की समाज-ान्प मे पदयोरि स्थान पर पपरे तथ्यों बोर पृथद मणायणयााा सम. सथसन बेस सपा न्घान रुका दूनफररर ये रद नया मत्य पर उम्पोगिदार स्पान पर एएरनसियपस्वाडि घतिशिएर घर उप सही दना सना मु नल नर दे कक पप्ण्ण 5. 2८. .स लि कक के न पल एस एन दादरसे हो शिए-लिय पिया जा पराला है लि पोसा सही है सारे घार्दर्स कक कर ध््ः व 2 नर रूप के इ. की सुस्सन भाद रसार शेगएए शदानपत यार गायाय एन कह




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :