मृत्यु - भोज तथा अन्य वैज्ञानिक कहानियां | Mrityu-bhoj Tatha Anya Vaigyanik Kahaniyan

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Mrityu-bhoj Tatha Anya Vaigyanik Kahaniyan by मनहर चौहान - Manhar Chauhan
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पुस्तक का साइज़ : 1.93 MB
कुल पृष्ठ : 158
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मनहर चौहान - Manhar Chauhan

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सृर्युन्भोज दर देखा । श्राशका से मुरली की आँखें फैल गयी । बही ऐसा न हो कि उठाने के साथ ही गेंद घधडाम से फट जाए । पोंद न फटी । पत्नी ने उसे उसी कॉरनर-टेवल पर रख दिया जहाँ मुरली ने भझपनी बेहोशी दूर होने के साथ उसे पहली वार देखा था । परनी दापस पलग की तरफ़ छाती हुई दुददुदा रही थी कॉरनर-टेदल पर से वह गेंद गिर कंसे गई ? पपता नहीं । गिरने की आवाज़ तो हुई होगी । शायद मुझे नहीं मालूम । क्या है बहू चीज ? एक फालतू पुर्जा । सफेंक्दू ? नही । सकयो 2 खुन्दर है-है न? ही है तो सुन्दर उसकी डिजायत में एक भ्रजीब-सा-सम्मोहन है 1 सम्मोहन ? मुरली की मौहि उठी । माप चौंके क्यो ? नहीं तो झौर सुरलो ने चाय वी श्रन्तिम चुस्की खीच कर खाली वप पल्नी की थोर बढ़ा दिया । पत्नी भी चाय पी चुकी थी । अब धाप सो जाइए शार्खे भूद वर । वह स्नेह से कुछ इस तरह बोली गोया उसके पति को मालूम ही न हो कि सोने के लिए भले भू दना जरूरी होता है । मुरली ने भाँखें सूद सी। सिडिक्‌ --दरवाज़ा बन्द होने की झावाज़ । भवश्य पत्नी जा चुकी थी मुस्ली ने बाँखें सोल दीं 1 उसे चैन नहीं था । कमरे में उसने सदर थी. भ्केला पाया । पत्नी अब तक किचन में पहुंच चुदी होगी




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