दर्शन के सौ वर्ष | Darshan Ke Sau Varsh

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Darshan Ke Sau Varsh by कलानाथ शास्त्री - Kalanath Shastriचादमल शर्मा - Chadmal Sharmaजॉन पैसमीर - Jon Paisameer

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कलानाथ शास्त्री - Kalanath Shastri

कलानाथ शास्त्री (जन्म : 15 जुलाई 1936) संस्कृत के जाने माने विद्वान,भाषाविद्, एवं बहुप्रकाशित लेखक हैं। आप राष्ट्रपति द्वारा वैदुष्य के लिए अलंकृत, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, संस्कृत अकादमी आदि से पुरस्कृत, अनेक उपाधियों से सम्मानित व कई भाषाओँ में ग्रंथों के रचयिता हैं। वे विश्वविख्यात साहित्यकार तथा संस्कृत के युगांतरकारी कवि भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के ज्येष्ठ पुत्र हैं।

परिचय
कलानाथ शास्त्री का जन्म 15 जुलाई 1936 को जयपुर, राजस्थान, भारत में हुआ। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में साहित्याचार्य तथा राजस्थान विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. की उपाधियाँ सर्वोच

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चादमल शर्मा - Chadmal Sharma

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जॉन पैसमीर - Jon Paisameer

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मिल तथा प्रिशानी प्रबुमदवाद 3 पिता पुत्र दाना वो ही इस सिद्धात ने सगमग एवं ही बारण से प्रमावित किया भ्रौर बह यह पा वि जिस देलानिव पद्धति से सादियत सप वे मनावभानिव अनदूतित प्रतिवत (पण्डीशण्ट रिफियेदस) का सपनता प्रूवक प्रयोग कर गहेंथ । उसमें इस मिद्धात था बापी सेस था, मौर इसने सावियत सप वे मनोवैनानितों वा समयन भी प्राप्त परना शुरू वर दिया था । इनवा विचार था वि इस सिद्धान्त ने भात्मा के स्वर्प वे सम्बप में ध्याप्त रूढ़ि भौर भषविश्वास को भाड़ दिया है श्र दसवें स्थान पर मनावशासिव विभठेषण या सतव भाधार प्रस्तुत पिया है । रमसे भी महत्वपूण वात पट है वि इस सिद्धान्त पे पास सम्द पी, दशने के होते मे व्याप्त, मूल मतभेटो वा निवारण बरव भ्नत पूर्गता को शवित वा परिचय लिया है । भपन पिता के सम्बंध मे स्टुभट मिस ने कहा वि उनरां मूल उद्देश्य परिस्थितियां वे सहारे विवसित मनुष्य मे ध्ाघार पर सपुध्य वी नैतिक श्र यौद्धिक दणा वा शिक्षा वे माध्यम से सुधार परसर या । पपन भारसिव भापणा मे उनवी भ्रतिम रचनाधा मे भी उनकी इस धारणा मे घही गमी नहां दिखाई दती । भ्रपन पिना में जा मौलिव मतभेद मित्र के थे उनका उदोंने तत्वास ही निकाल दिया था । इस बाते का प्रमाण उनवी 1869 मे लिखी पुस्तय दे सस्तेवशन झाव बोमेन मे जितना स्पष्ट रूप से मिलता है उतना भयत्र मिलना दुरम है । रस पुस्तर में उन्होंने सवेत दिया है वि नर माटाशों से यूननम सपप-शीज सतभेरों बा समय मी एसी स्थिनियाँ बम बरती रहती हैं जिद किसी स्वामसावितर विवास मे श्रमाद मे भी परिस्थितियों से उपजी हुई माना जा सवता है डम प्रसार यदि मभित ने हाट्ते से यह सीमा कि पता प्राप्त वरना संभव हैता बचम में मो यह कि बयास्ा मयुने सत्य मौिव भौर विशुद्ध सच्ची स्थितियां ने लिए धातव हाति हैं श्रौर उनवे सांग से बड़ी बाधा उत्पन्न बरते हैं । किननु कुछ सीमाम्ा तक ययम से मिल था सतभेर मी यानएसा सतमेद उममे हादल मे अति दखन मे नहीं आया । येयम पर लिखे ऐसे शान दे यम (1838) तथा ए० बेन वो झान सुलोसियेशन बढ्ोयर्सस (माइड, 1887) । बन यी इतियों द्वारा बितानों भ्नुमववादी परम्परा ने सनोविलान में प्रवेश क्या, बह बन भव कुछ स्पष्ट है । उनकी रचनाओं के लियं दप्टब्य फउूगल कौ उपयुवत इचि 1 साइड (1876) की स्थापना व लिय बन ते बड़ी महत्वपूरग मूमिया श्रदा की थी सब प्रयम संपादक कम रावट्सन भनुमववादी परम्परा के सुयाग्य सातत्यसाधव थे 1 उनका दुष्टिकोस प्रमुप रूप से मपोदिएान वी शोर था । वर्स उदान लिखा बढ़त बम ( उननें लेखों में स श्रघिकतर उनके दाशनिव अवशेष (फ्लोसाफ्किल रिमेन्स, उहै94) वे रूप मे पुन प्रकाशित किये सय थे | है




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