चिन्तामणि भाग 1 | Chintamani bhag - I

Chintamani  bhag - I by रामचंद्र शुक्ल - Ramchandra Shukla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उत्साह श्५्‌ न अच्छे होने की दूशा में भी वह के उस कठोर दुःख से बचा रहेगा जो उसे जीवन भर यह साच-साचकर होता कि मेंने पूरा श्रयत्र नहीं किया | कर्म में श्ानन्द्‌ लुभव करनेवालों ही का नाम कमंण्य है। धम और उदारता के उच्च कर्मों के घिधान मे ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रदता है कि कता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते हैं। श्त्याचार का दसन क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास श्र तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कमें-वीर का सच्चा सुख है । उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रददता जब तक कि फल प्राप्त न हो जाय बटिकि उसी समय से थोड़ा-धाड़ा करके मिलने लगता हे जब से वह कमें की छोर हाथ बढ़ाता है | कभी-कभी गानन्द का मूल विषय तो कुछ और रहता है पर उस घ्मानन्द के कारण एक ऐसी स्फूति उत्पन्न होती है जो बहुत-से कामों की ओर हुष के साथ अग्रसर करती है। प्रसन्नता और तत्परता को देख लोग कहते हैं कि वे काम बढ़े बत्साद से किए जा रहे हैं। यदि किसी मनुष्य को चहुत सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बढ़ी भारी कामना पृणण हो जाती है तो जो काम उसके सामने आते हैं उन सबको वह चढ़े हुषे ्और तत्परता के साथ करता है। उसके इस दृषे श्र तत्परता को भी लोग उत्साह ही कहते हैं । इसी प्रकार किसी चत्तम फल या सुख-प्राप्ति की छाशा या निश्चय से उत्पन्न छानन्द फलोन्मुख प्रयज्नों के अतिरिक्त ्यौर दूसरे व्यापारो के साथ संत होकर उत्साह के रूप में दिखाई पढ़ता है। यदि हम किसी ऐसे उ्ययोग में लगे है जिससे झागे चलकर हमे बहुत लाभ या सुख की झाशा है तो हम उस उद्योग को तो उत्साह के साथ करते ही हैं अन्य कार्यो में भी प्राय अपना उत्साह दिखा देते हैं । यद्द वात चर्साइ ही में नददीं छन्य मनोधिकारों में भी बरावर पाई जाती है। यंदि हम किसी बात पर क्रद्ध बैठे हैं और इसी बोच में कोई दूसरा झाकर हमसे कोई बात सीधी तरह भी पूछता है तो भी




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