चिन्तामणि भाग 2 | Chintamani bhag - 2

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Chintamani  bhag - 2  by रामचंद्र शुक्ल - Ramchandra Shukla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न्न्ड काव्य में प्राकृतिक दृश्य ७ किस प्रकार यहाँ से वहाँ तक एक पंक्ति मे चले गए हैं लताओ का कैसा सुन्दर मण्डप सा बन गया है कैसी शीतल मन्द सुगन्ध हवा चल रही है उनका प्रेम कोई प्रेम नहीं--उसे अधूरा समझना वाहिए 1 ये प्रककति के सच्चे उपासक नही । वे तमाशबीन हैं और केवल अनो- खापन सजावट या चमत्कार देखने निकलते हैं । उनका हृदय मनुष्य- प्रवर्तित व्यापारो में पड़कर इतना कुण्ठित हो गया है कि उससे उन सामान्य प्राकृत्तिक परिस्थितियों मे जिनमे अत्यन्त आदिस काल में सचुष्य- जाति ने अपना जीवन व्यतीत किया था तथा उन प्राचीन सानव- व्यापारो मे जिनमे वन्य दशा से निकलकर वह अपने निर्वाह ौर रक्षा के लिए लगी लीन होसे की घ्रत्ति दब गई अथवा यों कहिंए कि उनमे करोड़ो पीढ़ियो को पार करके आनेवाली झन्तस्संज्ञावर्तिनी यह झव्यक्त स्थृति नही रह गईं जिसे वासना या संस्कार कहते हैं । ये तड़क-भड़क सजावट रड्लो की चमक-दमक कलाओं की बारीकी यर भले ही मुग्ध हो सकते हो पर सच्चे सहदय नहीं कहे जा सकते । केंकरीले टीलो ऊसर पटपरो पहाड़ के उड़-खाबड़ किनारे या वबूल-करौंदे के भाड़ों मे कया ाकर्षित करनेवाली कोई बात सही होती ? जो फारस की चाल के वग्रीचो के गोल चौखूंटे कटाव सीधी-सीधी रविशे मेहूँदी के बने भरे हाथी-घोड़े काट-छॉटकर सुडौल किए हुए सरो के पेड़ो की कतारे एक पड्लि मे फूले हुए शुलाब आदि देखकर ही वाह-वाह करना जानते हैं उनका साथ सच्चे भावुक सहदयों को वेसा ही दुः्खदायी होगा जैसा सल्‍्जनों को खलों का । हमारे प्राचीन पूवेंज भी उपवन और वाटिकाएँ लगाते थे । पर उनका आदर कुछ और था । उनका आदशे वहीं था जो अब तक चीन और योरप में थोड़ा-बहुत बना हुआ है। आजकल के पार्कों मे हम भारतीय ्ञार्दशे की छाया पाते हैं हमारे यहाँ के उपवन वन के प्रतिरूप ही शोते थे। जो वनों में जाकर प्रकृति का शुद्ध स्वरूप और उसकी स्वच्छन्द




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