योग-चिकित्सा | Yog - Chikitsa

Yog - Chikitsa by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उपयोगी कसरत। .. -.... '. १५ अम्यासकों बढ़ाना चाहिए । पहले थोड़े दिनतक मनको याद दिलानी पड़ेगी, परन्तु कुछ दिनोंके बाद अम्यास बढ़ जाने पर मन आप-ही- आप स्राभाविक रीतिसे ध्यानस्थ हो जायगा | प्ररंतु जो साधक पूर्ण आरोग्य और व प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हों; उन्हें प्रतिदिन प्रातः काल मनको स्थिर करके एक क्रिया करनी चाहिए । पहले तो ऊपर कहे अनुसार शिथिठ होकर बाय मनको स्थिर करो, फिर अपने सामने हनुमान्‌ , भीष्म, रामभूर्ति अथवा और किसी महावलवान्‌ पुरुषका चित्र रखो । उसके शरीरके प्रत्येक अंगको प्रेमपूर्वक देखो और फिर नेत्र बंद करके नीचे छिखे अनुसार कह्पना करो-” मेरा शरीर वज़के समान इढ़ और दाक्तिमान्‌ है । मेरे हाथ पैर और सब शरीरके रनायु कठिन, मोठे और सशक्त हैं । मेरे दारीरके किसी भागमें भी रोग नहीं है | सम्पूर्ण शरीर भलौकिक चेतनशक्तिप्ते परिपूर्ण है। '” इस बिचारको मनमें खूब ह्विर करो । ऐसी कत्पना करके कि हम खत: वैसे हैं अपने हाथ, पाँव और छाती पर हाथ फेरो । बाखार नाभिपर्यन्त दी्घ श्वास छो । इस क्रियाको प्रतिदिन १० से १५ मिनिठतक करो । उपयोगी कसरत । संदेव विस्तरोंसे उठकर छत पर जाओ । यदि छत न हो तो कमेरेकी सब खिड़कियोँ खोलकर एक छिड़्काकि सामने खड़े हो जाओ। फिर अमृतमय वायुसे फेंफडोको भरो और तुरंत ही खाठी करो । इस प्रकार दी श्वास-प्रश्नासकी किया जब्रतक वन सके, करो | जब फेंफड़े श्रमित हुए माद्म पढ़ने ढगें, हृदय जोरसे धड़कने ठगे, और रक्त खूब तेजीसि दौड़ने छगे तब इस क्रियाको बंद . कर दो और आराम करो | इस प्रकार नित्य सबेरे और शामके समय खुली हवामें दी्घ श्वास-प्रश्वास छेनेकी कसरत किया करो । .




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