राज्य व्यवहार नीति | Rajy Vyavhar Niti

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Rajy Vyavhar Niti  by हिमांशु जोशी - Himanshu Joshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दिव-रत पसीना बहाते रहते तीन उस सारी रात गामि का सो न पाएं । तरह-तरह के विचार मन में उठते रहे। परमानन्द पण्डित ने मुत्यु से कुछ महीने पहले कहा था---लड़ाई खतम हो गई गंगा अंप्रेस हार गए । किन्तु काका को अब भी लगता कि अंग्रेज हार अवश्य गए किन्तु लड़ाई खतम कहा हुई ? तारा के घर में एक जून भी चूल्हा नहीं जलता । भवानी का होनहार बेटा दिग्यू पाठ- शाला नही जा पाता क्योकि किताबों के लिए पैसे की व्यवस्था नही हो पाती । इदिया लोहार की पहनी कफन के बिना ही जला दी गई । पट- बारी किसी निरपराधी को हथकड़ी लगाकर हीलात में ठूस देता है। इत्ती बड़ी दुनिया में कही कोई ठौर नही जहां आदमी जी सके दूसरी तरफ तिनका-तिनका जोड़कर उन्होंने यह घोसला बनाया था--कलह और कुपचित्त के अलावा यहां कया है ? भाई के दिल में भाई के लिए दर्द नहीं तो औरों के लिए क्‍या होगा उन्हें अजीव-सी रिक्तता का अहसास होने लगा । एक गहरी निराशा का । सुबह उठते ही उन्होंने देवा को बुलाया-- छोटी बहू ने कल जो किया मुझे अच्छा नहीं लगा । आखिर ऐसा भी कया था जो कपड़े जला दिए ? नये थे किसी ने पता नहीं किस भावना से दिए थे--घर मे कोई भी पहसे लेता । कया फरक पड़ता बड़ी बहू विधवा बिचारी के मन में बया गुजरी होगी देवा सिर झुकाए बैठा रहा । मेरी एक ही साध थी देवा--तुम लोग मेहनत-मजूरी करके दो टुकड़े आराम से खाओ । मिल-जुलकर प्रेम से रहो । किन्तु मुझे अब लगता है--वहू सब मुगतूृष्णा थी छल था । भुलावा था। तुम दो भाई हो सु-राज / 15




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