सम्यक्त्व-चिंतामणि | Samyaktav Chintamani

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Samyaktav Chintamani by पं पन्नालाल जैन साहित्याचार्य - Pt. Pannalal Jain Sahityachary

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“१४ सम्यक्त्वचिन्तामणि: झानावरणाविक और भावकम--रागादिक छरूग रहे हैं । ये किस कारणसे रूम रहे हैं, जब इसका विचार आता है तब आखवतत्त्व उपस्थित होता है । आलवके बाद जीव और अजीवकी क्या दशधा होती है, यह्‌ बतानेके किए बन्धदस्व अता है | आल़वका विरोधी भावसंवर है, बन्धका विरोधी भावनिर्जरा है तथा जव सव नोकर्म, द्रव्य कमं गौर भावकर्म जीवते सदाके लिए सर्वथा बिमुक्तो জার हैं तब मोक्षतत्व होता है । पुष्य भौर पाप আজাব अन्तर्गत है। इस तरह आत्मकल्याणके लिए उपयुक्त सात तत्व अथवा नौ पदार्थ प्रयोजनभूत हैं। इसका वास्तविक रूपसे निर्णय कर प्रतीति करना सम्यरदर्शन है। ऐसा न हो कि आस्तव और बन्धके कारणोंको संवर और निर्जराका कारण समप्त लिगया जाय अथवा जीवको रागादिकपूर्णं अवस्थाको जीवतस्व समक्ष ल्या जायया श्ीवकी बैभाविक परिणति (रागादिक) को सर्वथा भजीव समक्ष लिया जाय, - क्योंकि ऐसा समझनेसे बस्तुतत्त्वका सही निर्णय नहीं हो पाता भौर सही निर्णयके अमावमें यह आत्मा मोक्षको प्राप्त नहीं हो पाता । जिन भार्वोको यह जव मोक्षका कारण मानकर करता है वे भाव पुण्यास्रवके कारण होकर इस जीवको देवादिगतियोंमें सागरों पर्यन्तके लिए रोक लेते हैं। सात तत्त्वोंमें जीव और अजीवका जो संयोग है वह संसार हैं तथा आख्रव ओर बन्ध उसके कारण हैं। जीव और अजोवका जो वियोग--पृथग्‌भाव है वह मोक्ष है तथा संवर शौर निर्जरा उसके कारण हँ । जिस प्रकार रोगी मनुष्यको रोग, इसके कारण, शोगमुक्ति भौर उसके कारण चारोका जानना आवश्यक है उसी प्रकार इस जीवको संसार, इसके कारण, उससे मुक्ति और उसके कारण--चारोंका जानना आवद्यक हे । करणानुयोगमें मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति और अनन्तानु- बन्धौ क्रोध-मान-माया-लोम इन सात प्रकृतियोंके उपद्यम, क्षयोपश्म अथवा क्षयसे होनेवाली श्वद्धागुणकी स्वामाविक् परिणतिको सम्यग्दर्शन कहाहै। करणानुयोगके इस सम्यर्दर्शनके होनेपर चरणानुयोग, प्रथमानुयोग और द्रव्यानु- योग॑में प्रतिपादित सम्यरदर्शन नियमसे हो जाता है। परन्तु शेष अनुयोगोंके सम्यग्दर्धन होनेपर करणानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन होता भी है और नहीं भी होता है। मिथ्यात्वप्रकृतिके अवान्तर भेद असंड्यात लोक प्रमाण होते ह । एक भिष्यात्वप्रकतिके उदयम सातवें नरककी आयुका बम्ध होता है गौर एक मिभ्यात्वप्रकृतिके उदयमें नौव प्रैवेय$की आयुका बन्ध होता है । एक भिथ्यात्व- प्रकृतिके उदयमें इस जीवके मुनिहत्याका भाव होता है और एक मिथ्यात्वप्रकृति- के उदयमें स्वयं मुनित्रत धारण कर अद्ठाईस मूलगुणोंका निर्दोष पालन करता है। एक मिध्यात्वके उदयमें कृष्ण लेब्या होतों है और एक मिथ्यात्वके उदयमें




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