वो दुनिया | Wo Duniya

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Wo Duniya by यशपाल - Yashpal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संन्यासी ] १३ भी उसे ठुरंतं नोकरी नहीं मिली । शीला के माता-पिता उसके वर के सन्वन्ध सँ दुबारा বিদ্যার करने रूगे ! उस समय उसकी इच्छा हुई कि घरती फट जाय श्र वह उस्म समा जाय । जिनके चरणों में एक बेर श्रात्मसमर्पण कर दिया “उससे! दूर झरूत्यु भी उसे न कर सकेगी । माता-पिता के सम्मुख कुछ कह सकता सम्भव न था परन्तु वह मरना ती जानती थी । विवाह कया चोँदी के ठीकरों से किया जाता है ? वह तो चात्मा का सम्बन्ध है; जन्मजन्मान्तर का सम्बन्ध ! आत्सविश्वास और अपने पौरुप के विश्वास से नरदेव का सीना फल मया । शीला को ग्रपमी बहो से ल, किसी सुदूर श्रमरत्यद्त संसार की ओर देखते हुए उसने कहा--“शीला प्रिये, झुके जान पड़ता है पिछले অন্ন में भी हम एक साथ किसी तपोषन की फूलों से छाई शमि पर यों घूमते-फिरते थे । वयु ने श्राकर उस नाटकं पर पटात्तेप कर दिया । जीवन फी नयी परिस्थितियों सें फिर हम लोग केसे श्रा मिले ? केसे हम दोलों ने एक दूसरे को पहली ही दृष्टि में पहचान लिया ?” उत्तर में मरदेव के सीने पर सिर रखकर शीला ने आँखें मूँद लीं । भूत छर भविष्य के झपने अमिद आत्सिक सस्वन्ध पर दोनों ने दीर्घ चुस्वन फी मोहर लगादी । दो रासाय जो पक हो चुकी धी, शरीरो की एयकता जिन्हें दूर किये हुए थी, सशरीर एक हो गई । उस अन्तर- हयेन सामीप्य मे किसी न्यूनता श्रौरं श्रवसाद्‌ की अनुभूति के लिये स्थान न रह गया । ्रास्माश्चों का प्रबल राक्षर शरीरो फे एकीकरण के रूप मैं चरितार्थ होने लगा। बैंक की उडी के अतिरिक्त नरदेव और शीला का सब समय




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