राजस्थान का इतिहास भाग 1 | Rajasthan Ka Itihas Part- I
श्रेणी : इतिहास / History, भारत / India

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
27.08 MB
कुल पष्ठ :
726
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)राजस्थान का इतिहासकरौली राज्य का अधिकाश भाग शुरसेन देश के अन्तर्गत थे । शुरसेन 'राज्य की
राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट (बैराट) और कुरु की इन्द्रप्स्थ थी । 5उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम “'शिवि' था जिसकी राजधानी मध्यमिका थी ॥
आजकल मध्यमिका को नगरी कहते है जो चित्तोड से ७ मील उत्तर मे है । वहाँ पर.
मभेव जाति का अधिकार रहा जिससे उसे भेदपाट या प्राग्वाट भी कहा जाने लगा,
अथवा सतत् रूप से यहाँ के शासक म्लेच्छो से सघर्ष करते रहे अतएव इस देश को “मेद'
अर्थात 'म्लेच्छो को मारने वाला” की सज्ञा दी गयी और उसे मेदपाट कहने लगे ।
डूँगरपुर, वाँसवाडा के प्रदेश को वागड कहते थे । आज भी यह भाग उसी नाम से
जाना जाता है। जोधपुर के राज्य को मरु और फिर मर्वार और मारवाड कहा
जाने लगा । जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुजेरत्रा कहते थे और सिरोही के हिस्से की
गणना अर्वुद (आवू) देश मे होती थी । जैसलमेर राज्य का पुराना नाम माड था गौर
कोटा तथा बूँदी, जो पहले सपादलक्ष के अन्तर्गत थे, हाडौती कहलाने लगे । झालावाड
राज्य और टोक के छवडा, पिरावा तथा सिरौज मालव देश के अन्तर्गत माने जाते थे ४इसी प्रकार भौगोलिक विशेषताओ को लेकर भी कुछ राजस्थान के भागों के
नाम रखे गये थे । उदाहरणा्थ, माही नदी के पास वाले प्रतापगढ के भू-भाग को
*काठल' कहा जाता था, क्योकि बह माही नदी के काँठे अर्थात किनारे का या सीमा का
भाग था । प्रतापगढ भौर वाँसवाडा के वीच के भाग मे ५६ ग्राम-समूह थे अतएव उस
भाग का नाम छप्पन कहलाने लगा । डूंगरपुर गौर वाँसवाडा के वीच के भाग को
भेवल और देवलिया और मेवल के निकटवर्ती प्रदेश को मुढोल (मण्डल) कहते थे,
क्योकि वह एक स्वतन्त्र मण्डल था । भैसरोडगढ से लेकर विजोलिया के पठारी भाग
को ऊपरमाल कहते थे । जरगा और रागा के पहाडी भाग हमेशा हरे-भरे रहते ये
अतएव उसे 'देशहरो' कहा जाता था । उदयपुर के आसपास पहाडियाँ होने से उस
प्रान्त को गिरवा कहते थे ।ऊपर के वर्णन से स्पष्ट है कि जिस देश के भू-भाग को भमाजकल हम राजस्थान
कहते हैं वह किसी विशेष नाम से कभी प्रसिद्ध नही रहा । मुगल इतिहासकार “राजपुत
शब्द को वहुवचन मे लिखने में “राजपूर्ता” प्रयुक्त किया करते थे । इसी ब्गधघार पर3. महाभारत, भीष्मपर्व, अ० €, श्लो० ३४, विप्णुपुराण, अश ४, अध्याय २१,
मेकडोनल और कीथ, वैदिक इण्डेक्स, जि० १, पू० १६६, नर्निघम, कार्प्स
इन्सक्रिपशन्स इण्डिकेरमू, जि० १, पृ० ६६-६७, ओझा, राजपुताने का
इतिहास, पृ० २४. बृहत् सहिता, अ० १४, कूर्म विभाग, इ्लो० १२, कीति कौमुददी, सर्ग ३, शलो० *,हर्पनाथ का लेख, अमर कोप, काण्ड दे, भूमिवर्ग, इलो० ४, घटियाले कालेख, एपि० इण्डिं०, जि० ६, पू० २८०नेणसी ख्यात, पत्र €, ११, १२, ४५, डा० गोपीनाथ शर्मा, दि सोशल लाइफ इनमेडीवल 'राजस्थान, पृ० ३कट
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Anju Gehlot
at 2022-03-05 01:20:01Ramesh.kumar
at 2021-08-31 17:06:30