हिंदी काव्य की कलामयी तारिकाएँ श्री व्यथित हृदय - Shri Vyathit hardy | Hindi Kavya Ki Kalamayi Tarikaye

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Hindi Kavya Ki Kalamayi Tarikaye  by श्री व्यथित हृदय - Shri Vyathit Hridy

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श० हिन्दी काव्य कीं कल्लामयीं तारिकाए मे ही नहीं विश्व-साहित्य में भी मीरा को अमर बना दिया है। मीरा की सी श्रेम-साघिका और बवियोग-गायिका कदाचित्‌ ही ससार के किसी साहित्य मे उपलब्ध हों सके । वह प्रेम वह वियोग वह आकुलता और वह तल्लीनता मीरा के पदों को छोड कर उस 9 और कहाँ दर्शन हो सकता है ? मीरा के गीति काव्य उनके विरहद के गीति-काव्य हैं उनकी अपनी वियोग-वेदना के सजीव चित्र है । उन्होंने अपने पदों से अपने जिस प्रियतम का आह्वान किया है वास्तव मे उसके लिये उनका हृदय छुटपटाता रददता था । वे उस से मिलने के लिये प्रचरड आँघी से भी झधिक गतिवान और समुद्र से भीं झधिक गभीर थीं । अत्याचारो की अप मे जलती थी कष्टो शोर यत्रणाओ की काडियों मे हसतीं सुस्कराती हुई पैर बढ़ाती थीं किन्तु प्रियतम के नौम को क्षणभर के लिये भी अपने ओठो से न विलग करती थी । प्रियतम के प्रेम और उसके झभाव ने उन्हे स्वय श्रेम और वेदना मय बना दिया था । उनके पच भूतात्सक शरीर से वे नहीं बोलती थी बल्कि बोलता था उनका प्रेम उनकी वेदना और उनका विरहद । वे दिन रात चारों ओर प्रेम मे मतवाली बन कर विरह के गीत छिटकारती फिरती थी । ऐसे गोत छिटकारती फिरती थी जिनमे कि उनका हृदय बोलता था उनके प्राण ककृत होते थे । मीरा के इस प्रेम-विरह मे एक बहुत बडी विशेषता है और यहीं विशेषता उनके वास्तविक प्रेम का वास्तविक चित्र भी




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